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यहां भी है 52वां शक्तिपीठ, राजाभोजकाल से भी प्राचीन है यह मंदिर

राजा भोज के कार्यकाल में हुआ था मंदिर का जीर्णोद्धार...>

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शाजापुर। स्कंद पुराण में कथा है कि दक्ष प्रजापति ने आयोजित यज्ञ में महादेव को आमंत्रित नहीं करने से नाराज होकर यज्ञ में पहुंचीं माता सती ने भोलेनाथ का अपमान होते देख यज्ञकुंड में प्रवेश कर लिया था। बाद में पहुंचे वीरभद्र ने माता की देह कुंड से निकालकर भोलेनाथ को दी थी। देह को लेकर निकले क्रोधित महादेव के क्रोध को कम करने के लिए भगवान विष्णु ने माता सती के शरीर के चक्र से टुकड़े कर दिए थे। ऐसे में देह के अंग जहां भी गिरे वहां शक्तिपीठ स्थापित हो गए। माता का दाहिना चरण यहां पर गिरा था। इस चरण का निशान अभी-भी यहां है जिसका पूजन किया जाता है।

हजारों वर्ष प्राचीन मां राजराजेश्वरी के मंदिर में दर्शनार्थ पहुंचे शंकराचार्य स्वरूपानंदजी ने मंदिर की स्थिति को देखने के पश्चात स्कंद पुराण में उल्लेख शक्तिपीठ के आधार पर इसे 52वां गुप्त शक्तिपीठ बताते हुए मां त्रिपुर सुंदरी की स्थापना की थी। हाइवे के समीप स्थित मां राजराजेश्वरी मंदिर के पुजारी पं. आशीष नागर ने बताया माता का मंदिर चमत्कारी है। बकौल नागर दादाजी मंदिर के पुजारी पं. हरिशंकर नागर ने बताया कि 1982 से लेकर 1992 के बीच मां राजराजेश्वरी के दरबार में देश के चारों पीठ के शंकराचार्यों ने दर्शन करने के बाद इसे 52वां गुप्त शक्तिपीठ बताया था।

1991 में यहां पहुंचे शंकराचार्य स्वरूपानंदजी ने स्कंद पुराण के अनुसार मंदिर की स्थिति को देखते हुए इसे शक्तिपीठ कहा था। मंदिर के पीछे से निकली चीलर नदी मंदिर के ठीक पीछे चंद्राकार (चंद्रभागा) है। ऐसा स्थान कोणार्क के बाद शाजापुर में ही है। यहां माता के दाहिने चरण का निशान है। इसके चलते 10 दिन रुककर शंकराचार्य ने मां मंदिर के समीप मां त्रिपुर सुंदरी की स्थापना की थी। साथ ही मंदिर में छत पर बने श्रीयंत्र को माता के समक्ष स्थापित किया था।

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तत्कालीन सिविल सर्जन और स्टॉफ ने करवाई थी सिंह प्रतिमा की स्थापना

नागर ने बताया माता के गर्भगृह के बाहर सभा मंडप में हवन कुंड था। 1970 में दादाजी पूजन कर रहे थे तभी कुंड के स्थान पर सिंह बैठा दिखाई दिया। कुछ देर बाद सिंह यहां से निकलकर मंदिर के समीप स्थित आगर-मुंबई राष्ट्रीय राजमार्ग से स्टाफ के साथ गुजर रहे तत्कालीन सिविल सर्जन के चार पहिया के सामने आकर खड़ा हो गया था। ऐसे में तत्कालीन सिविल सर्जन सहित समस्त स्टाफ ने माता की आराधना की तब सिंह चला गया। इसके बाद सिविल सर्जन व स्टाफ ने एक-एक माह का वेतन देकर कुंड के स्थान पर सिंह प्रतिमा की स्थापना कराई थी।


पुजारी ने बताया मंदिर का जीर्णोद्धार राजाभोज के कार्यकाल में 1060 में हुआ था। मंदिर के आगे सभा मंडप का निर्माण 1734 में हुआ था। पं. नागर ने बताया पूर्व में माता के गर्भगृह के ठीक बाहर के स्थान पर शनिदेव मानकर पूजन किया जाता था। 1968 में दादाजी पं. हरिशंकर नागर को स्वप्न आया था कि यहां शिव परिवार की प्रतिमा है जिसे बाहर निकाला जाए। सुबह जब आरती करके निकले तो देखा जहां शनिदेव मानकर पूजन किया जाता था वहां पर चूहा बिल बनाकर बाहर निकला। जब बिल के अंदर झांककर देखा तो महादेव की प्रतिमा दिखाई दी। इसके चलते खुदाई करवाने पर माता सती को उठाए महादेव की प्रतिमा के साथ संपूर्ण शिव परिवार और त्रिशूल, चिमटा निकला था। इसकी विधिवत स्थापना की गई।