
मन्नत पूरी होने पर 30 फीट ऊंची मचान पर झुलाया झूला
कराहल(श्योपुर). तहसील क्षेत्र कराहल के ग्राम बमोरी में उस समय भील जनजाति संस्कृति की झलक हिलोरे लेती नजर आई, जब यहां गल देवता के मेले में भील समुदाय के 35 गांवों के लोग बड़ी संख्या में जुटे। अपनी विभिन्न मन्नतों के साथ मेले में उमड़े लोगों ने लोक सांस्कृतिक कार्यक्रम और लोक गीतों के बीच लोक देवता दलबाबा की पूजा अर्चना की। साथ ही जिनकी मन्नत पूरी हुई, उनको 30 फीट ऊंची मचान से गल (झूला) भी झुलाया गया।
कराहल से करीब 10 किलोमीटर दूर स्थित ग्राम बमोरी भील जनजाति बाहुल्य ग्राम है। यहां स्थित गल बाबा के स्थान पर हर साल धुलेंडी के दिन धार्मिक मेले का आयोजन किया जाता है। इसी क्रम में मंगलवार को धुलेंडी को दिन यहां मेला आयोजित किया गया और गल बाबा की पूजा की। इसके साथ ही गल बाबा की मचान बनाकर मन्नत मांगने वाले लोगों को झुलाया गया। ऐसी मान्यता है कि इस झूले में झूलने से मनोकामनापूर्ण होती है। इसके साथ ही दल बाबा से रोग,व्याधी, महामारी आदि सहित अन्य प्रकोप से बचाने की भी मनोकामना की गई। ग्रामीणों के मुताबिक ये परंपरा सालों से चली आ रही है। यहां के जनजाति समाज के लोगो को ये भरोसा है कि उनका देवता जमीन और आसमान दोनों पर राज करता है। इसलिए उसे खुश करने के लिए ये लोग जमीन और आसमान के बीच घूमते हैं।
ऐसे झूलवाते हैं झूला
परंपरा अनुसार भील आदिवासी समाज के लोग पहले तो एक 30-40 फीट ऊंचा मचान बनाते हैं और फिर इस पर क्रेन के जैसे झूला झुलाया जाता है, जिसे गल झुलाना भी कहते हैं। इस दौरान मन्नतधारी को उसके परिजन रंगीन कपड़े और पगड़ी पहनाकर गीत गाते हुए पूजा स्थल तक लाते हैं। यहां तड़वी यानी पुजारी पहले उससे पूजा करवाता है, फिर उसे मचान पर चढ़ाकर झूले पर उलटा लटका देता है। इसके बाद झूले के दूसरे हिस्से पर टंगी रस्सी से लटकाकर लोग झूलते हैं और दूसरी तरफ लटका हुआ मन्नतधारी आसमान में झूलता रहता है। चक्कर पूरा होने पर फिर उससे पूजा करवाई जाती है।
Published on:
11 Mar 2020 09:30 pm
बड़ी खबरें
View Allश्योपुर
मध्य प्रदेश न्यूज़
ट्रेंडिंग
