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1300 साल पहले बरगद के पेड़ में प्रकट हुई बड़वासन माता

बड़ौदा की बड़वासन माता की अद्वितीय है महिमा, सप्तमी को होता है साडबाड का कार्यक्रम    

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1300 साल पहले बरगद के पेड़ में प्रकट हुई बड़वासन माता

1300 साल पहले बरगद के पेड़ में प्रकट हुई बड़वासन माता

बड़ौदा (श्योपुर). बड़ौदा नगर के वार्ड 11 स्थित माताजी मोहल्ले में 1300 साल पुराना बड़वासन माताजी का मंदिर अपनी अद्वितीय महिमा के लिए न केवल बड़ौदा और बत्तीसा क्षेत्र बल्कि दूर-दूर तक जनआस्था का प्रतीक है। लगभग 1300 साल पहले एक बरगद (स्थानीय बोली में बड़) के पेड़ में प्रकट हुई माता के मंदिर का निर्माण नाथू बंजारा ने कराया था।

कहा जाता है कि कभी यहां घनघोर जंगल हुआ करता था और एक विशाल बरगद के पेड़ के नीचे बंजारेे अपना डेरा डाला करते थे। इसी के तहत नाथू बंजारा अपने परिवार सहित यहां ठहरा हुआ था। इस दौरान उसके परिवार की बालिकाएं यहां खेल रही थी। तभी माता अपनी तीन बहनों और भैरवजी के साथ यहां आई और भैरवजी को 50 गज दूर छोडक़र बालिकाएं बनकर बंजारा बालिकाओं के साथ खेलने लगी।

जब लोगों ने देखा कि ये बालिकाएं अपनी नहीं है तो एक बंजारन ने माताजी को टोक दिया, उसी समय माता प्रकट होकर बरगद के पेड़ में स्थापित हो गई। यही वजह है कि बंजारों व लोगों को साक्षात शक्ति का एहसास हुआ, जिसके चलते वैशाख सुदी अक्षय तृतीय संवत 982 में नाथू बंजारे ने माता बड़वासन के स्थान का निर्माण करवाया। वहीं मंदिर से 50 गज दूर भैरवजी का भी स्थान है।

सप्तमी को होता है मंदिर में साडबाड का कार्यक्रम

मंदिर के पुजारी मांगीलाल गौड़ बताते है कि माताजी ने कोसवार गौड़ परिवार से कहा कि तुम व तुम्हारा परिवार मेरी सेवा करोगे। हालांकि गौड़ परिवार ने मना किया कि यह हमारी बस की बात नहीं है, लेकिन माताजी नहीं मानी और माताजी ने कहा कि सप्तमी के दिन में जहां भी होऊंगी, लेकिन समझ लेना कि मैं यहीं हूं। यही कारण है कि शारदीय नवरात्रि सप्तमी की रात्रि को विशेष पूजा आयोजित होती है। उसके बाद इसी दिन पुजारियों व गौड़ परिवार के प्रत्येक सदस्य द्वारा चमचमाती तलवारों से अपनी पीठ पर वार किए जाते हैं, जिसे यहां साड बाड लेना कहा जाता है। विशेष बात यह है कि तलवारों से वार करने के बाद भी पुजारियों के शरीर से खून नहीं निकलता है। साडबाड देखने यहां बड़ी संख्या में भीड़ उमड़ती है।