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कृष्ण और सुदामा दो मित्र का नहीं जीव व ईश्वर का मिलन था

भागवत कथा के दौरान कृष्ण-सुदामा प्रसंग का किया वर्णन

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कृष्ण और सुदामा दो मित्र का नहीं जीव व ईश्वर का मिलन था

कृष्ण और सुदामा प्रसंग के दौरान सजाई गई सजीव झांकी।

बड़ौदा. सुदामा से परमात्मा ने मित्रता का धर्म निभाया। राजा के मित्र राजा होते हैं रंक नहीं। पर परमात्मा ने कहा कि जिसके पास प्रेम धन है वह निर्धन नहीं हो सकता। कृष्ण और सुदामा दो मित्र का मिलन ही नहीं जीव व ईश्वर तथा भक्त और भगवान का मिलन था, जिसे देखने वाले अचंभित रह गए थे। आज मनुष्य को ऐसा ही आदर्श प्रस्तुत करना चाहिए।
यह बात गुरनावदा गांव में चल रही श्रीमद् भागवत कथा के दौरान कथा वाचक पं. दीपक कृष्ण शास्त्री ने कृष्ण और सुदामा मित्रता का वर्णन करते कही। कृष्ण और सुदामा जैसी मित्रता आज कहां है। यही कारण है कि आज भी सच्ची मित्रता के लिए कृष्ण सुदामा की मित्रता का उदाहरण दिया जाता है। सुदामा नाम सुनते ही द्वारिकाधीश नंगे पांव मित्र की अगवानी करने पहुंच गए। लोग समझ नहीं पाए कि आखिर सुदामा में क्या खासियत है कि भगवान खुद ही उनके स्वागत में दौड़ पड़े। श्रीकृष्ण ने स्वयं सिंहासन पर बैठाकर सुदामा के पांव पखारे। कृष्ण सुदामा चरित्र प्रसंग पर श्रद्धालु भाव विभोर हो उठे। उन्होंने कहा कि श्रद्धा के बिना भक्ति नहीं होती तथा विशुद्ध हृदय में ही भागवत टिकती है। भगवान के चरित्रों का स्मरण, श्रवण करके उनके गुण, यश का कीर्तन, अर्चन, प्रणाम करना, अपने को भगवान का दास समझना, उनको सखा मानना तथा भगवान के चरणों में सर्वस्व समर्पण करके अपने अंतकरण में प्रेमपूर्वक अनुसंधान करना ही भक्ति है। श्रीकृष्ण को सत्य के नाम से पुकारा गया। जहां सत्य हो वहीं भगवान का जन्म होता है।