21 जनवरी 2026,

बुधवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

इस महिला के जीवन में हुआ ऐसा वैराग्य धारण कर बन गईं साध्वी,जानें इनकी स्टोरी

प्रेमलता पुष्पाश्री बन गुजरात में पढ़ा रही शांति और अहिंसा का पाठ

2 min read
Google source verification
mahavir swami l

जयसिंह गुर्जर @ श्योपुर। किशोरावस्था में विवाह होने के बाद दांपत्य जीवन दो साल भी नहीं चला कि पति की मृत्यु हो गई। पति की मौत का ऐसा सदमा लगा कि सांसारिक जीवन से मोहभंग हो गया। परिणामस्वरूप न केवल सार्वजनिक जीवन का त्याग कर वैराग्य धारण कर लिया,बल्कि जैन साध्वी बनकर कठिन तपस्या की राह पर भी चल पड़ीं। यह कहानी है श्योपुर जैन साध्वी के रूप में दीक्षा ग्रहण करने वाली प्रेमलता की। श्योपुर निवासी प्रेमलता वर्तमान में जैन साध्वी श्री पुष्पाश्री जी के रूप मेंं जैन समाज के प्रसिद्ध तीर्थस्थल पालीताणा (गुजरात) में शांति और अहिंसा का पाठ पढ़ा रही हैं।

आज से लगभग साठ साल पूर्व दीक्षा ग्रहण करने पुष्पा श्री श्योपुर के सकल जैन समाज के लिए आदर्श की प्रतिमूर्ति बन गई हैं। बताया गया है कि वर्ष 1952 में ग्वालियर की पुत्री प्र्रेमलता जैन का विवाह श्योपुर निवासी नेमीचंद जैन के साथ से हुआ था। विवाह के दौरान प्रेमलता की उम्र 17 साल थी। लगभग दो साल तक नेमीचंद और प्रेमलता का दांपत्य जीवन सुखमय बीता,लेकिन 2 जून 1954 को प्रेमलता के जीवन पर पहाड़ सा टूटा जब उनके पति नेमीचंद बंजारा डैम सीप नदी में नहाने गए और पैर फिसलने के कारण डूब गए और उनकी मृत्यु हो गई।

बस यहीं से प्रेमलता का सांसारिक मोह छूट गया और उन्होंने वैराग्य धारण करने का निर्णय लिया। यही कारण रहा कि जैन मुनियों के सानिध्य में प्रेमलता ने वर्ष 1955 में जैन साध्वी के रूप में दीक्षा ली और मां पुष्पाश्री बनकर वैराग्य के कठिन मार्ग पर निकल पड़ी।

साठ साल में एक बार चातुर्मास
वर्ष 1955 में दीक्षा ग्रहण करने के बाद सार्वजनिक जीवन और सांसारिक मोह त्यागने के बाद जैन साध्वी श्री पुष्पा श्री ने श्योपुर भी छोड़ दिया और वर्तमान में गुजरात के पालीताणा में रह रही हैं। हालांकि देश के कई जैन धर्मावलंबियों वाले शहरों में वे चातुर्मास कर चुकी हैं,लेकिन पिछले साठ सालों में उन्होंने श्योपुर में एक बार ही चातुर्मास किया है। वर्ष 1978 में चातुर्मास के दौरान वे श्येापुर में रही और यहां के जैन धर्मावलंबियों को शांति का पाठ पढ़ाया।