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आधुनिक सजावट के बीच खोती जा रही मांडणा कला

राजस्थानी संस्कृति में बसे श्योपुर के ग्रामीण परिवेश में दीपावली पर महिलाएं घरों के आंगन और दीवारों पर बनाती है मांडणा, अब कला हो रही विलुप्त

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आधुनिक सजावट के बीच खोती जा रही मांडणा कला

महिलाओं द्वारा बनाया गया मांडणा।

श्योपुर. पाश्चात्य संस्कृति और आधुनिकीकरण के दौर में अब दीपावली के त्योहार पर भी आधुनिकता का रंग चढ़ रहा है। यही वजह है कि राजस्थानी संस्कृति में रचे-बसे श्योपुर जिले में ग्रामीण लोककला की शान रही मांडणा कला (मांडना) अब धीरे-धीरे अपनी पहचान खोती जा रही है। जिसके चलते एक दशक पूर्व तक दीपावली और अन्य तीज त्योहारों के साथ मंगल कार्यों के मौके पर घरों को सजाने-संवारने में सबसे आगे रहने वाली मांडणा कला बीते जमाने की बात हो गई है।


हालांकि जिले के ग्रामीण क्षेत्र में इक्का-दुक्का स्थानों पर मांडणे बने हुए दिख जाते हैं, लेकिन शहरी क्षेत्र से यह कला लगभग गायब हो गई है। घरों को सजाने के लिए एक दशक पूर्व तक जो मांडणे मांडे जाते थे, उनमें छह फूल्या, पगल्या जैसे मांडने शामिल रहा करते थे। इन कलाकृतियों की खास बात ये होती थी कि इन्हें कितने ही बड़े और छोटे साइज में बनाया जा सकता था। मांडणा कला के कलाकार बताते हैं कि इसमें हर सीजन और हर त्योहार के मांडणे रहते हैं। जैसे पगल्या का मांडणा खास तौर पर दीप पर्व के लिए किया जाता है। यूं तो मूलत: ये मांडणा राजस्थान की लोककला है, लेकिन एक दशक पूर्व तक श्योपुर जिले में भी इसका खासा जोर था। इसे विशेष अवसरों पर महिलाएं जमीन अथवा दीवार पर बनाती हैं।


कलाकारों की थी पूछ परख


एक दशक पूर्व तक जिले में प्रत्येक तीज त्योहार मांडणा कला के बिना अधूरा माना जाता था। जिलेभर में इसके कलाकारों की खासी पूछ-परख थी। लोग हर तीज त्योहार पर इन कलाकरों को याद कर उनसे अपने घरों की साज-सज्जा करवाया करते थे, लेकिन आज बदलते हुए समय के साथ ही मांडणा कला लगभग बंद सी हो गई है।


लोक संस्कृति की पहचान


मांडला कला हमारी लोक संस्कृति की पहचान है, लेकिन अब ये आधुनिकता की दौड़ में खो गई है, इसे संरक्षण की आवश्यकता है। सहरिया संग्रहालय में हमने इसे संजोया हुआ है।
कैलाश पाराशर, समाजसेवी, श्योपुर