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श्योपुर जिला- इतिहास, प्रकृति और संस्कृति की अनूठी त्रिवेणी है, जहां का कण-कण है जिले का गौरव

MP के पिछड़े जिलों में शुमार श्योपुर जिले की मिश्रित संस्कृति से यहां की अलग पहचान धार्मिक, ऐतिहासिक और प्राकृतिक अद्वितीय स्थलों से समृद्ध है जिला, सिर्फ विकास की दरकार

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श्योपुर@जयसिंह गुर्जर

श्योपुर जिला यूं तो विकास से अछूता होने के चलते प्रदेश का एक पिछड़ा जिला है, लेकिन अपनी अद्वितीय ऐतिहासिक, प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत की अनूठी त्रिवेणी सहेजे हमारा श्योपुर प्रदेश में अलग पहचान रखता है। यही वजह है कि भले ही शासन-प्रशासन बुधवार को गौरव दिवस के रूप में मना रहा हो, लेकिन श्योपुर जिले का कण-कण यहां के हर व्यक्ति के लिए गौरव की बात है।

लगभग 6600 वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैले श्योपुर जिले जहां तीन अलग-अलग संस्कृतियों और बोलियों (श्योपुर-बड़ौदा क्षेत्र में राजस्थानी संस्कृति, विजयपुर-वीरपुर क्षेत्र में बृज संस्कृति और कराहल क्षेत्र में सहरिया आदिवासी संस्कृति) का समावेश एकता का संदेश देता तो यहां का प्राकृतिक सौंदर्य (56 फीसदी भूभाग पर वनक्षेत्र) मनमोह लेता है। वहीं कई ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल भी जिले को एक अलग पहचान देते हैं।

हालांकि 25 मई 1998 को जिला बनने के 24 साल बाद भी श्योपुर का अपेक्षानुरूप वो विकास नहीं हो पाया, जिसकी उम्मीद मुरैना से अलग होने के समय की गई थी, लेकिन कछुआ चाल ही सही हमारा श्योपुर आगे तो बढ़ रहा है और कुछ बड़े प्रोजेक्ट्स आगामी बरसों में धरातल पर उतरने की उम्मीद है।

राष्ट्रीय पहचान दिलाते कूनो पार्क और चंबल सेंचुरी
जिले के लगभग 56 फीसदी भूभाग वनाच्छादित होने और दर्जनों नदियां होने से श्योपुर प्राकृतिक दृष्टि से पूरी तरह समृद्ध है। यही वजह है कि यहां का कूनो नेशनल पार्क और चंबल घडिय़ाल सेंचुरी श्योपुर को राष्ट्रीय पहचान दिलाते हैं।

वहीं चंबल घडिय़ाल अभयारण्य का भाग रामेश्वर त्रिवेणी संगम के साथ ही वन क्षेत्र में स्थित डोब कुंड, देव खो, नटनी खोह, फूलदेह का झरना, नीमोदा मठ आदि सहित बड़ी संख्या में प्राकृतिक स्थल यहां की पहचान हैं। हालांकि इनमें से कुछ स्थल ऐसे हैं, जिन्हें अभी विकास की दरकार है।

श्योपुर के इतिहास के कथाकार हैं कई स्मारक
ऐतिहासिक दृष्टि से भी श्योपुर न केवल समृद्ध है, बल्कि यहां के कई स्मारक श्योपुर के इतिहास की कथा स्वयं बयां कर रहे हैं। श्योपुर का किला अपने आप में अद्वितीय हैं, जो राष्ट्रीय संरक्षित स्मारक (वर्तमान में इसके तीन स्मारक राज्य संरक्षित हैं) की पूरी पात्रता रखता है।

इसके अलावा वनांचल में स्थित ऐतिहासिक डोबकुंड, राज्य संरक्षित स्मारक विजयपुर का किला, सिपहसालार का मकबरा, मानपुर की गढ़ी, काशीपुरा की गढ़ी, ढोढर की गढ़ी, भूरवाड़ा का शिव मंदिर, बड़ौदा किला, बड़ौदा का चंद्रसागर मंदिर, धनायचा का जैन मंदिर, के साथ ही पूरे एशिया में इंजीनियरिंग का बेहतरीन नमूना पार्वती एक्वाडेक्ट और कूनो सायफन भी अपने आप में अद्वितीय हैं।

एक नजर में ऐसे समझें श्योपुर जिले को...
25 मई 1998 को बना श्योपुर जिला 66 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल है जिले का 56 फीसदी क्षेत्रफल में जिले में है वनक्षेत्र 07 लाख की आबादी है श्योपुर जिले में 03 नगरीय निकाय हैं, जिले में 03 जनपद पंचायत क्षेत्र हैं और जिले में 225 ग्राम पंचायत हैं साथ ही जिले में 526 ग्राम भी हैं।

हमारी सांस्कृतिक और धार्मिक आस्था को पहचान देते ये आयोजन
जिले में ऐतिहासिक औेर प्राकृतिक स्थलों के साथ ही कई धार्मिक स्थल ऐसे भी हैं, जहां यदि धार्मिक और सांस्कृतिक स्थल और आयोजन श्योपुर को अलग पहचान देते हैं। इन स्थलों पर आस्था के साथ हजारों-लाखों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। त्रिवेणी संगम रामेश्वर, विजयपुर का छिमछिमा हनुमान मेला, बड़ौदा का चंद्रसागर, उतनवाड़ का धु्रव कुंड, जमूर्दी का पार्वती मंदिर, दुर्गापुरी, पनवाड़ा अन्नपूर्णा माता, सांप्रदायिक सद्भाव की मिशाल नीमोदा पीर आदि धार्मिक स्थल अद्वितीय है।

मुक्तिबोध जन्मे तो अटल का बचपन बीता
श्योपुर की धरा पर कई महापुरुषों और विभूतियों का जुड़ाव भी रहा है। महाकवि गजानन माधव मुक्तिबोध ने तो श्योपुर में जन्म लिया, वहीं पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के बचपन का कुछ समय यहां बीता है। इसके साथ ही नागदा में बाबा सी ज्योतिर्देव(इनके अनुयायी बाबा को सुभाषचंद्र बोस मानते रहे हैं) रहे। वहीं मान्यता है कि भगवान परशुराम ने तो जिले के रामेश्वर त्रिवेणी संगम पर तपस्या भी की, तो पांडवों ने श्योपुर क्षेत्र में कुछ समय के लिए अज्ञातवास भी बिताया।