
हृदय रोगी
सिद्धार्थनगर. दीपावली के मौके पर पटाखे जलाना किसी की भी सेहत को ही प्रभावित नहीं करेगी बल्कि दिल के मरीजों के लिए जानलेवा साबित हो सकती है। मासूमों के कान के पर्दे भी प्रभावित हो सकते है। थोडी देर की खुशी के लिये किसी का भी जीवन पटाखा तबाह कर सकता है। पटाखे की सामान्य आवाज मानव के आवाज सुनने की सहन क्षमता से कई गुना अधिक होती है।
पटाखे के प्रयोग को लेकर तमाम जागरूकता अभियान चलाए जाने के बाद भी इसके कारोबार पर कोई खास असर नहीं पड़ा। बीते वर्ष पटाखे को प्रयोग नहीं करने व दिया जलाने के भी संकल्प का असर दीपों के पर्व पर नहीं दिखा। जिसका परिणाम यह रहा कि बीते वर्ष भी जमकर पटाखे जलाए गए। पटाखों से कई नुकसान होने की जानकारी के बाद भी इसके इस्तेमाल में कमी नहीं आना भविष्य के लिए खतरनाक माना जा रहा है।
डॉक्टरों की माने तो पटाखा सेहत के लिए किसी भी तरह से उचित नहीं है। यह स्वयं के साथ साथ दूसरों की भी सेहत को काफी प्रभावित करता है। पटाखे की शोर से दिल के मरीजों को तथा धुएं से दमा के मरीजों को दूर रहना चाहिए। डॉ.सुबोध चन्द्रा के अनुसार के दिल मरीज के लिए 130 से 150 डेसिबल की आवास घातक साबित हो सकती है। कई बार को शोर का असर इंसान के ब्लड प्रेशर पर भी पड़ता है। कार्डियो के जानकार डॉ.सीबी चौधरी की माने तो अचानक तेज आवाज दिल के मरीज को परेशानी में डाल सकता है। ऐसे में दिल के मरीज को शोर से सतर्क रहने की जरूरत है।
ईएनटी सर्जन डॉ.एके झा के अनुसार पटाखे की शोर से बच्चों के कान का पर्दा सबसे अधिक प्रभावित होता है। बच्चों को पटाखों की शोर से दूर रखना चाहिए। कोशिश यह हो कि बच्चों के साथ कम आवाज वाले पटाखों का इस्तेमाल किया जाय। अधिक आवाज पर बच्चों के कान के पर्दे भी प्रभावित हो सकते हैं। जिससे उसकी सुनने की क्षमता कम होने के साथ सुनने की क्षमता क्षीण भी हो सकती है। पटाखे की आवास 120 से 150 तक होता है। जबकि मानव के कान के पर्दे महत 30 से 60 डेसिबल तक के ही शोर सहन कर सकते हैं। नेत्र सर्जन डॉ.संजय गुप्ता क अनुसार कई पर पटाखों की चिंगारी आंख को खराब कर देती है। पटाखे की रोशनी से भी बच्चों की आंख प्रभावित हो सकती है। इसलिए बच्चों को पटाखे से दूर रखने की सलाह दी जाती है।
फेफड़े को कमजोर बनाती है सल्फर ऑक्साइड
पटाखों से निकलने वाली जहरीली गैस शरीर को प्रभावित करती है। पटाखे के जलने के बाद निकलने वाली नाइट्रोजन आक्साइड, पोटेशियम व सल्फर आक्साइड सहित अन्य जहरीली गैस मानव शरीर में पहुंच कर उनके फेफडे को प्रभावित करती है। इसे फेफडा प्रभावित होता और मानव कई सांस सहित कई बीमारियों का शिकार हो जाता है। फेफडे के कमजोर होने से प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है, दमा के मरीजों के लिए यह गैस परेशानी का सबब बनने के साथ ही जानलेवा भी साबित हो सकता है। डॉक्टरों की माने तो पटाखों से निकलने वाली गैसों से बचाव न किया जाय तो दमा मरीज का दम भी निकल सकता है।
आंख कान व स्किन को भी प्रभावित करता है पटाखा
पटाखा आंख, कान के साथ स्किन को भी प्रभावित करता है। अगर पटाखे का धंुआ खुले हुए शरीर के किसी भी अंग पर लगता है तो शरीर एलर्जी का का शिकार हो जाता है। कान के पर्दे प्रभावित होने से सुनने की क्षमता प्रभावित होने के साथ क्षीण भी हो सकती है। ईएनटी सर्जन डॉ.एके झा के अनुसार अधिक आवाज से बच्चों के साथ ही किसी के भी कान का पर्दा फट सकता है।
जिले में एक दिन पटाखा जलाने से पर्यावरण पर कुछ खास असर नहीं पड़ता है। जनसंख्या कम होने के कारण यहां पर पटाखे के धुएं का असर नहीं दिखता है। पटाखे के शोर से लोगों के शरीर पर असर जरूर पड़ता है। पटाखे का शोर 120 से 150 डेसिबल तक होता है।
Published on:
17 Oct 2017 10:11 am
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