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जिले में बदहाल है आयुर्वेद की सरकारी चिकित्सा व्यवस्था

जिले में कुछ ऐसे भी अस्पताल है जहां पर तीन दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी डॉक्टर तैनात नहीं हो सके हैं।

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Government Ayurveda Hospital in Siddharthnagar

Government Ayurveda Hospital in bad condition in Siddharthnagar

सिद्धार्थनगर. जिले में धनवंतरि की आयुर्वेद चिकित्सा का बुरा हाल है। सबसे पुरानी चिकित्सा पद्धति का दायरा बढ़ने के बजाय घटने लगा है, या यूं कहे कि आयुवेर्दिक चिकित्सा घर की रसोई तक ही सिमट कर रह गई है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। जिले में धनवंतरि के आयुर्वेदिक चिकित्सालयों का बुरा हाल है। जिले में कुछ ऐसे भी अस्पताल है जहां पर तीन दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी डॉक्टर तैनात नहीं हो सके हैं। जिले के कई क्षेत्रों में सरकारी आयुर्वेदिक चिकित्सा व्यवस्था के बारे में लोगों को जानकारी ही नहीं है। अस्पतालों में दवाएं तो आ रही है लेकिन उन्हें लेने वालों की संख्या काफी कम है। सरकारी आयुर्वेदिक अस्पतालों की बात करें तो 25 बेड वाले अस्पतालों में प्रत्येक माह नया पुराना मिलाकर महज साढ़े तीन से चार सौ मरीज ही आते है। अस्पतालों की बदहाली व स्वास्थ्य कर्मचारियों के नहीं रहने के कारण लोगों सबसे पुरानी चिकित्सा पद्धति से लोगों का विश्वास उठने लगा है।

आयुर्वेदिक चिकित्सालय, नौगढ़ पुराना नौगढ़ कस्बा स्थित राजकीय आयुर्वेदिक चिकत्सालय में दो डॉक्टर तैनात है, जो धनवंतरि जयंती पर दिल्ली में आयोजित होने वाले कार्यक्रम में हिस्सा लेने गए है। यहां पर तैनात चीफ फार्मासिस्ट हरीशचन्द्र मिश्र, फार्मासिस्ट हरीशचन्द्र, रमेश चन्द्र द्विवेदी, स्टाफ नर्स मनोरमा सिंह, वार्ड आया प्रेमलता चिकित्सालय पर मौजूद रहे। फार्मासिस्ट के अनुसार अस्पताल में पर्याप्त दवाएं मौजूद हैं। कर्मचारियों की कमी के कारण सभी को परेशानी होती है। कर्मचारियों के अनुसार आयुर्वेद कि चिकित्सा व्यवस्था और भी बेहतर होनी चाहिए। यहां पर प्रत्येक माह साढ़े तीन से चार सौ मरीज इलाज के लिए आते हैं। स्वीपर व अन्य कर्मचारियों के अभाव में अस्पताल परिसर की सफाई नहीं हो पाती है।

आयुर्वेदिक अस्पताल तेलौरा किराए के भवन में चल रहा। गोल्हौरा का राजकीय आयुर्वेदिक चिकित्सालय तेलौरा के नाम से संचालित हो रहा है। लेकिन किराए के भवन में अस्पताल का संचालन जिगिनिहवा में चल रहा है। उधार के डाक्टर से काम चलाया जा रहा है। यहां तीन कर्मचारी है। डॉ.अजय कुमार सप्ताह में दो दिन के लिए तैनात है। शुक्रवार, शनिवार फर्मासिस्ट रमेश शुक्ला व वार्ड ब्वाॅय दीनानाथ मिश्र है। वहीं राजकीय आयुर्वेदिक चिकित्सालय बराव नानकार मे एक बजे पहुंचने पर पता चला कि पांच दिन पहले आए थे सोमवार को वह अस्पताल दस बजे पहुंचे तो बिना गेट खोले ही अस्पताल देखकर चले गए। उनके अलावा वहां पर कोई भी कर्मचारी नहीं आता है।

पथरा बाजार में स्थित आयुर्वेदिक अस्पताल में दो दशक से डॉक्टर नहीं है। दो दशक पहले यहां पर डॉक्टर तैनात थे तो लोगों का इलाजा होता था लेकिन डॉक्टर के स्थानान्तरण के बाद से यहां पर किसी की तैनातीन ही की गई। जिससे यहां के लोगों को आयुर्वेदिक चिकित्सा व्यवस्था के तहत इलाज की सुविधा नहीं मिल पा रही है। यहां पर तैनात फार्मासिस्ट कभी कभार ही यहां पर आते है, जिससे अस्पताल अक्सर बन्द रहता है। यहां पर तैनात चैकीदार हफीजुल्लाह के कंधे पर अस्पताल के निगरानी की जिम्मेदारी है। अस्पताल सांसद निधि से बनाया गया है। यहां पर आयुर्वेदिक चिकित्सा व्यवस्था सुधार को लेकर जिम्मेदार गम्भीर नहीं है।

राजकीय आयुर्वेदिक चिकत्सालय, डुमरियागंज 25 बेड वाले राजकीय आयुर्वेदिक चिकित्सालय 30 वर्ष से शाहपुर में एक निजी भवन में किराए पर चल रहा है। यहां पर भी डॉक्टर की तैनाती नहीं है। अस्पताल का संचालन फार्मासिस्ट के भरोसे किया जा रहा है। यहां पर तैनाती चीफ फार्मासिस्ट विजय प्रकाश पाठक ने बताया कि यहां पर पांच कर्मचारियों की तैनाती है। यहां पर प्रतिदिन 30 से 40 मरीज देखे जाते है। अस्पताल पर सभी प्रकार की दवाएं उपलब्ध रहती है, जिससे कोई भी बिना दवा के खाली हाथ नहीं जाता है। अस्पताल का भवन बदहाल है।

जिले के अस्पतालों पर एक नजर

जिले में 25 शैय्या वाले दो आयुर्वेदिक अस्पताल है। जिसमें से डुमरियागंज के बिथरिया व दूसरा डुमरियागंज के ही शाहपुर में स्थित है। शहर के पुराना नौगढ़ कस्बा में 15 बेड का आयुर्वेदिक अस्पताल स्थापित है। जबकि चार बेड वाले 34 आयुर्वेदिक अस्पताल है। जिले में आयुर्वेद के है सात डॉक्टर जिले में राजकीय आयुर्वेद चिकित्सालयों की संख्या 38 है और दो यूनानी चिकित्सालय है। जहां पर डॉक्टरों के 40 पद सृजित है। लेकिन वर्तमान में जिले में महज नौ डॉक्टर ही तैनात है। शेष कई अस्पतालों का संचालन फार्मासिस्ट के सहारे हो रहा है। फार्मासिस्ट सभी अस्पतालों पर तैनात है। इसके बाद भी ज्यादातर अस्पतालों में ताला लटका रहता है। सभी अस्पतालों पर वार्ड ब्याय तैनात है लेकिन स्वीपर की भी संख्या काफी कम है। स्वीपर के सृजित 41 पदों के सापेक्ष महज 28 स्वीपर ही जिले के चिकित्सालयों पर
तैनात है। जिसके चलते लोगों तक आयुर्वेद की चिकित्सा पहुंचाने में मुश्किलें आ रही है।

आयुर्वेदिक यूनानी चिकित्सा के मुख्य चिकित्साधिकारी डाॅ. संतोष कुमार त्रिपाठी ने बताया कि आयुष मिशन के तहत मिलती है दवाएं राजकीय आयुर्वेदिक चिकित्सालयों पर केन्द्र सरकार के आयुष मिशन के तहत दवाएं उपलब्ध कराई जाती है। वर्ष में एक बार दवाओं की खेप लखनऊ से ही अस्पतालों की मांग के अनुसार तय मात्रा में आती है, जिसे सीधे सम्बंधित अस्पतालों पर भेज दिया जाता है। जहां से दवाओं का वितरण लोगों के बीच कराया जात है। कोट, डॉक्टर व अन्य कर्मचारियों तथा संसाधनों की कमी के कारण आयुर्वेद चिकित्सा को लेकर काफी परेशानी होती है। फिर भी प्रतिवर्ष डेढ़ लाख से अधिक मरीज आुयर्वेद चिकित्सा व्यवस्था पर भरोसा जताते हैं। सितम्बर माह में ही 13000 मरीजों का इलाज आयुर्वेदिक अस्पतालों पर किया गया। लोग तुरंत राहत के फेर में आधुनिक चिकत्सा पद्धति की ओर भाग रहे हैं।

by Suraj Chauhan


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