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कॉलेज में एंकरिंग करते-करते चर्चित कलाकार बन गई यह युवती,24 साल की उम्र में संरक्षित कर रही लोक परंपराएं

मप्र के निमाड़ क्षेत्र के छोटे से गांव धामनौद की रहने वाली अंकिता बार्चे की कहानी, छोटी उम्र में चला रहीं कर्मयोगी थिएटर ग्रुप

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This young lady became a famous artist doing anchoring at college

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सीधी. पढ़ाई के दौरान एंकरिंग का शौक था और इसे पूरा करते-करते वह एक सफल रंगकर्मी बन गई। जिस नाटक में पहला किरदार अदा किया, उसी के निर्देशक को दिल दे बैठीं। अब दोनों हमेशा के लिए एक साथ हैं। कहानी कर्मयोगी थिएटर ग्रुप की रंगकर्मी अंकिता बार्चे की है।
भोपाल से महाउर महोत्सव में प्रस्तुति देने आईं रंगकर्मी अंकिता ने बताया कि वे मूलत: निमाड़ क्षेत्र के छोटे से गांव धामनौद की रहने वाली है। हायर सेकेंड्री तक की शिक्षा वहीं पूर्ण की। इसके बाद भोपाल में मास कम्युनिकेशन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की पढ़ाई शुरू की। निजी एफएम चैनल रेडियो मिर्ची में एक वर्ष तक एंकरिंग की। इसके बाद रेड एफएम में चयन हो गया। इसी दौरान थिएटर का शौक बढ़ा। कुछ दिन एक चैनल में काम किया। इसके बाद दूरदर्शन में चयन हो गया।

गांव में हुई थी पढ़ाई
फिलहाल आकाशवाणी से जुड़ी हैं। गुडमॉर्निंग एमपी व युगवाणी की एंकरिंग करती हैं। इसके साथ-साथ अंकिता निमाड़ की लोक परंपराओं को संरक्षित करने की दिशा में भी काम कर रही हैं। कहा, मेरा गांव महाराष्ट्र की सीमा से लगा है। महाराष्ट्र की तर्ज पर निमाड़ में गणगौर पर्व धूमधाम से मनाया जाता है। मान्यता है कि रणूबाई नवरात्र में मायके आई थीं, दशहरा के दिन धनिया राजा उसे बुलाने आते हैं और उनकी विदाई में इस दिन गांव से लेकर शहर की सभी लोकगीत गाते व नृत्य करते हुए गांव में भ्रमण करती हैं।

थिएटर के खिलाफ थे पिता, मां ने बढ़ाया हौसला
अर्चना ने बताया कि भोपाल आने के बाद थिएटर की ओर रुझान बढ़ा तो परिजनों को जानकारी दी, लेकिन पिता इसका विरोध करने लगे। लेकिन मेरी जिद को देखते हुए मां ने भरपूर सहयोग दिया। वे चूंकि, व्यवसाय से जुड़ीं थी। लिहाजा, महिलाओं की आजादी के पक्ष में थीं। जिसका फायदा मुझे मिला। मां के प्रोत्साहन की बदौलत ही आज सफल रंगकर्मी बन पाई। अब पिता भी उनके निर्णय से संतुष्ट हंै। २४ वर्षीय अर्चना ने बताया कि पांच साल से खुद की कमाई से खर्चा चला रही हूं। कहती हैं रंगमंच पर हम पैसा क्यों नहीं ढूंढ पाए ये हमारी कमी है। उन्हें इस बात का मलाल भी है कि भारत का रंगमंच उस उंचाई तक नहीं क्यों नहीं पहुंच पाया, जहां से फिल्मी दुनिया की तर्ज पर कमाई देने वाला व्यवसाय साबित हो सके।

रंगमंच लोगों का दर्द समझना सिखा देता है
रंगमंच एक इंसान की ङ्क्षजदगी जीना सिखा देता है। दूसरे के करेक्टर के अंदर घुसकर किरदार निभाना हमें उस पात्र के दर्द को अपने अंदर समावेशित कर लेता है। नजदीक से उस पात्र को महसूस करने के कारण रंगमंच हमें दूसरों के दर्द को समझना सिखा देता है।

अपने सपनों पर विश्वास करें लड़कियां
महिलाओं को संदेश देते हुए अर्चना ने कहा, हमें अपने सपनों पर विश्वास होना चाहिए। परिवार से लड़कर नहीं बल्कि विश्वास में लेकर रास्ते पर आगे बढऩा होगा। लड़कियों को शादी तक नहीं सिमटना चाहिए, बल्कि अपनों सपनों में जान डालकर मंजिल तक पहुंचना चाहिए।