21 जुलाई 2026,

मंगलवार

Patrika Logo
home_icon

मेरी खबर

epaper_icon

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

सरकारी स्कूलों से 14 लाख बच्चे हुए गायब, सिस्टम पर उठे सवाल

कोरोना काल में ऊंची छलांग लगाने वाले सरकारी स्कूलों के नामांकन के ग्राफ ने फिर गहरा गोता लगाया है।
3 min read
Google source verification

सीकर

image

Sachin Mathur

Jan 05, 2024

सरकारी स्कूलों से 14 लाख बच्चे हुए गायब, सिस्टम पर उठे सवाल

सरकारी स्कूलों से 14 लाख बच्चे हुए गायब, सिस्टम पर उठे सवाल

कोरोना काल में ऊंची छलांग लगाने वाले सरकारी स्कूलों के नामांकन के ग्राफ ने फिर गहरा गोता लगाया है। दो साल पहले तक 99.3 लाख तक पहुंचा नामांकन इस बार करीब 14 लाख की कमी के साथ 85.42 लाख पर लुढक़ गया। पिछले साल के मुकाबले भी ये करीब 11 लाख कम हुआ है, जो नामांकन में अब तक की सबसे बड़ी गिरावट है। बढ़े नामांकन को बचा नहीं पाने से सरकारी नाकामी के साथ सरकारी शिक्षण व्यवस्था की पोल उधडकऱ सामने आ गई है।

दो साल बढ़ा, फिर घटा नामांकन
कोरोना काल से अब तक का नामांकन देखें तो सरकारी स्कूलों में दो साल नामांकन बढ़ा। 2019—20 में जो नामांकन 85 लाख था, वो 2020-21 में 87 और 2021-22 में बंपर बढ़त के साथ 99.3 लाख तक पहुंच गया। पर इसके बाद नामांकन में फिर गिरावट शुरू हुई। 2022-23 में नामांकन 96.3 तो इस बार बड़ी गिरावट के साथ 85.42 लाख पर सिमट गया।

5वीं में सबसे ज्यादा, 12वीं में कम
सरकारी स्कूलों में इस साल सबसे ज्यादा नामांकन कक्षा पांच में 8 लाख 32 हजार 958 हुआ है। जबकि सबसे कम नामांकन कक्षा 12 में 4 लाख 95 हजार 314 रहा। इनके अलावा कक्षा एक में 594669, दो में 763094, तीन में 826199, चार में 757035, छह में 801182, सात में 788708, आठ में 763028, नौ में 794447, दस में 600890 और कक्षा 11 में 554623 बच्चों का प्रवेश हुआ।

इन 10 वजहों से निकला स्कूलों का दम
1. प्रवेशोत्सव के समय प्रदेश के सरकारी स्कूलों में सवा लाख शिक्षकों की कमी रही। जिनमें 60 हजार शिक्षक थर्ड ग्रेड, 28 हजार शिक्षक सैकंड ग्रेड, 32 हजार फस्र्ट ग्रेड व बाकी संस्था प्रधानों के रहे।
2. पिछली सरकार ने अच्छे नामांकन वाली पंचायत स्तर की हिंदी माध्यम स्कूलों तक को अंग्रेजी माध्यम में तो बदल दिया, लेकिन स्टाफ नहीं लगाया। ग्रामीण क्षेत्रों में अंग्रेजी माध्यम और शिक्षकों की कमी दोनों वजहों से बच्चों ने इन स्कूलों से पलायन कर दिया।
3. शिक्षा विभाग में शिक्षकों की डीपीसी नहीं की गई। ऐसे में रिक्त पदों को नहीं भरा जा सका और शिक्षण व्यवस्था प्रभावित हुई।
4. पिछले दो साल में क्रमोन्नत साढ़े छह हजार स्कूलों में शिक्षकों के पद स्वीकृत नहीं करने से शैक्षिक व्यवस्था बिगड़ गई।
5. इस सत्र में चुनाव सहित शिक्षक 67 तरीके के गैर शैक्षिक कार्यों में लगे रहे। इससे वे नामांकन वृद्धि पर पूरा फोकस नहीं कर पाए।
6. शिक्षा अधिकारियों की मोनिटरिंग भी प्रभावी नहीं रही। ज्यादातर शिक्षा अधिकारी निरीक्षण की औपचारिकता करते रहे।
7. स्टाफिंग पैटर्न नहीं अपनाने से स्कूलों में छात्रों की संख्या के हिसाब से शिक्षकों का अनुपात बिगड़ा रहा। इसका असर शिक्षण व्यवस्था और नामांकन पर पड़ा।
8. सुविधाएं समय पर नहीं मिलने से भी सरकारी स्कूलों से मोह भंग बढ़ा। बच्चों को यूनिफोर्म समय पर नहीं मिली। साइकिल व लैपटॉप सरीखी योजनाएं तो लागू ही नहीं हो पाई। पोषाहार में भी गड़बडिय़ां मिली।
9. चुनावी साल में शिक्षकों को तबादलों की उम्मीद व डर दोनों रहे। इस गफलत में भी वे समर्पण से काम नहीं कर पाए।
10. प्रदेश के हजारों शिक्षकों की विभिन्न विभागों में प्रतिनियुक्ति से भी नामांकन पर असर पड़ा।

इनका कहना है:
प्रवेशोत्सव के समय प्रदेश में सवा लाख शिक्षकों की कमी, शिक्षकों के गैर शैक्षिक कार्य, डीपीसी की कमी सहित कई मुद्दे नामांकन घटने की वजह रहे। सभी मुद्दों पर समय- समय पर आंदोलन व सरकार से वार्ताएं भी की, लेकिन सुनवाई नहीं होने पर नामांकन कमी का ये नतीजा निकला है।
उपेंद्र शर्मा, प्रदेश महामंत्री, राजस्थान शिक्षक संघ शेखावत।

विद्यालय क्रमोन्नति के बाद 2 वर्ष तक पद स्वीकृत नहीं किये गए। वरिष्ठ अध्यापक व व्याख्याता की पदोन्नति पिछले तीन सत्र से बकाया चल रही है। पदरिक्तता के कारण नामांकन में कमी हुई है। सीधी भर्ती प्रक्रिया भी लम्बे समय तक प्रक्रियाधीन रहने के कारण पदरिक्तता का ग्राफ बढ़ता है। अत: अतिशीघ्र क्रमोन्नत विद्यालयों में पद स्वीकृत करके बकाया पदोन्नतियों की जानी चाहिए।

- बसन्त कुमार ज्याणी, प्रदेश प्रवक्ता, राजस्थान वरिष्ठ शिक्षक संघ, रेस्टा