
पशुओं को अपने ‘भगवान’ की तलाश
योगेश पारिक फतेहपुर. प्रदेश में यूं तो पशुपालन महत्वपूर्ण स्थान रखता है और रोजगार का भी प्रमुख स्रोत है। प्रदेश की अर्थव्यवस्था में 10 प्रतिशत का करीब राजस्व पशुपालन से आता है। उसके बाद भी सरकारों की बेरूखी इस कदर हावी है कि पशु चिकित्सालय खुद वेंटीलेटर पर है। पशु चिकित्सालयों में खाली पदों की भरमार है। यहां तक ही कई पद तो 90 फीसदी तक रिक्त हैं।
ऐसे में पशुओं का इलाज तो दूर की बात अस्पताल खुद बीमारू हालत में है।
प्रदेश के पशुचिकित्सालयों में चिकित्सकों व पशुधन सहायकों के पद तो रिक्त है ही, साथ ही पशधन परिचर, जलधारी व सफाईकर्ता के पद भी बड़ी संख्या में खाली पड़े हैं। ऐसे में पशुचिकित्सालों में साफ सफाई के साथ साथ अन्य कार्य भी रूके पड़े है। अधिकतर किसान पशु रखते हैं, पशुओं के बीमार हो जाने पर किसानों को भारी मशक्कत करनी पड़ती है, दूर दराज लेकर जाना पड़ता है। साथ ही समय पर इलाज नहीं मिलने के कारण कई पशु दम तोड़ देते हैं। इससे किसानों व पशुपालकों को आर्थिक नुकसान झेलना पड़ता है। प्रदेश के पशुपालन महत्वपूर्ण होने के बाद भी इस ओर कम ध्यान दिया जाना सवाल खड़े करता है।
निजी अस्पतालों की संख्या भी है कम
प्रदेश में पशुओं के लिए निजी चिकित्सालय भी बेहद कम है। इसलिए मजबूरन किसानों को सरकारी पशु चिकित्सा संस्थानों में ले जाना पड़ता है। ऐसे में पहले गाड़ी से पशु को लेकर जाना व बाद में वहां पर चिकित्सक व अन्य स्टॉफ नहीं मिलने से परेशानी होती है। पर रिक्त होने के चलते एक चिकित्सक को दो व उससे अधिक संस्थानों का कार्यभार दे रखा है। ऐसे में वहां से बैरंग लौटना किसानों के लिए बहुत कष्टदायी होता है। प्रदेश में बेरोजगार युवाओं की भरमार है, उन्हें भर्तियों का इंतजार है। इधर संस्थाएं खाली पड़ी है। प्रदेश में वरिष्ठ पशु चिकित्सा अधिकारी के 1123 पद स्वीकृत है। इनमें से 175 पद रिक्त है। इनमें सर्वाधिक रिक्त पद डूंगरपुर व प्रतापगढ़ जिले में खाली है।
डूंगरपुर में स्वीकृत 32 पद में से 25 रिक्त पड़े है वहीं प्रतापगढ़ में स्वीकृत 17 पदों में से 12 पद रिक्त पड़े है। प्रदेश की पशु संस्थाओं में पशु चिकित्सा अधिकारियों के स्वीकृत पद आधे से ज्यादा खाली पड़े है। प्रदेश में पशु चिकित्सा अधिकारियों के 1937 पद स्वीकृत है, इनमें से 1044 पद काफी समय से रिक्त चल रहे है।
Published on:
02 Mar 2020 05:36 pm
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