
राजस्थान में यहां घोड़ों में ग्लैंडर्स रोग की पुष्टि
प्रदेश के गोवंश में फैले लंपी वायरस के कहर के बाद अब घोडों में ग्लैंडर्स बीमारी ने दस्तक दे दी है। लम्पी की तरह ही लाइलाज इस बीमारी ने पशुपालकों सहित चिकित्सा विभाग की नींद उड़ा दी है। हिसार के अश्व अनुसंधान केन्द्र प्रयोगशाला ने नीमकाथाना के कोटडा गांव में एक पशुपालक की छह घोड़ियों में ग्लैंडर्स रोग की पुष्टि की है। रोग की पुष्टि होने के बाद पशुपालन और स्थानीय प्रशासन दलबल के साथ पहुंचा तब तक ग्लैंडर्स रोग के कारण दो घोड़ियों की मौत हो चुकी थी। इस पर टीम ने बीमार चार घोड़ियों को यूथेनाइज (मारा) किया। रविवार से क्षेत्र के तीस किलोमीटर के दायरे में अश्व वंश के जानवरों के सेम्पल लेना शुरू कर दिया है। साथ ही प्रशासन को घोडों के परिवहन और पशुपालक के परिवार के सैम्पल लेने के लिए पत्र लिखा है। इसके बाद छह फिट गहरा गडढ़ा खुदवाकर मृत घोडों को दफनाया गया। गौरतलब है कि पूर्व में ग्लैंडर्स रोग के कारण पुष्कर में लगने वाले पशु मेले पर भी रोक लगा दी गई थी।
इंसानों में खतरा
वायरस जनित ग्लैंडर्स संक्रमण ज्यादा खतरनाक इसलिए भी है कि संक्रमित घोड़े के संपर्क में आने वाले इंसानों को भी अपनी चपेट में ले सकती है। इससे पूर्व झुंझुनूं जिले में इस बीमारी के चपेट में आने के दो ही मामले सामने आए हैं। जो शख्स या पशु बीमार घोड़ा की चपेट में आ जाता है,उसका कोई उपचार नहीं होता। गाइडलाइन के अनुसार जांच में घोड़ा ग्लैंडर्स पॉजिटिव पाया जाता है, तो उसे मार दिया जाता है। साथ ही उस इलाके के 30 किलोमीटर तक के क्षेत्र में रहे जानवरों की भी ग्लैंडर्स जांच की जाती है। ऐसे में संक्रमित घोड़े की देखभाल करने वाले पालक की भी जांच की जाती है. गधा, खच्चर आदि में इसका संक्रमण फैलने का खतरा ज्यादा रहता है।
तो नहीं होता नुकसान
कोटडा गांव के रहने वाले पशुपालक नीरज कुमार का आजीविका साधन घोडियों को शादी समारोह में किराए पर भेजना रहा है। पशुपालक का आरोप है कि समय रहते क्षेत्र में स्क्रीनिंग होती रहती तो उसका भारी इतना भारी नुकसान नही होता। एक घोडी के बीमार होने के कारण उसकी अन्य स्वस्थ घोडियां ग्लैंडर्स की चपेट में आ गई। इधर पशुपालन विभाग के अधिकारियों ने बताया कि पशुपालक की ओर से पिछले दिनोें सीमावर्ती क्षेत्र से एक घोडी लेकर आया था। जो बीमार थी। जिसके उपचार के लिए उसने झुंझुनूं जिले से किसी उपचार करने वाले को बुलाया लेकिन सुधार नहीं हुआ। इस पर उसने 14 जुलाई को स्थानीय चिकित्सक को दिखाया। जहां से बीमार घोडी का सेम्पल हिसार भेजा गया। जहां से रोग की पुष्टि होने के बाद सभी घोडियों को थूथेनाइज करने के आदेश आए। इस पर कार्रवाई की गई।
संक्रमण के कारण और बचने के उपाय
रोग निदान प्रयोगशाला के प्रभारी डॉ. वीरेन्द्र शर्मा के अनुसार घोड़ो को निमोनिया, पल्मोनरी एबसिसेस, प्लुरल इफ्युजन होने की स्थिति में फेफड़ों में संक्रमण हो सकता है. बीमार होने पर पशुओं से दूर रहें। मास्क लगाकर काम करें। ग्लैंडर्स का समय पर इलाज नहीं किया जाए तो 7 से 10 दिन में यह मौत का कारण बन सकता है. इसलिए पशुओं में लक्षण दिखते ही डॉक्टर से जांच करवाएं।
जांच की सुविधा नहीं
किसी घोड़े को ग्लैंडर्स वायरस का संदिग्ध माना जाता है तो उसके ब्लड की जांच करने के लिए राजस्थान में कोई उचित व्यवस्था नहीं है. इसके सैंपल को हरियाणा के हिसार में स्थित अश्व अनुसंधान केंद्र भेजा जाता है. वहां दो चरणों में इसकी जांच की जाती है. उसके बाद रिपोर्ट को अंतिम रूप देकर जारी किया जाता है।
तीस किलोमीटर के दायरे में लेंगे सैम्पल
इनका कहना है
कोटडा में ग्लैंडर्स रोग की पुष्टि होने के बाद अब क्षेत्र की तीस किलोमीटर की परिधि में सैम्पल लिए जाएंगे। पशुपालकों को घबराने की जरूरत नहीं है। एहतियात के तौर पर घोडों के परिवहन पर रोक लगाने के लिए जिला प्रशासन को पत्र लिखा है। साथ ही स्वास्थ्य विभाग को पीडित परिवार के सैम्पल लेने के लिए लिखा गया है।
डॉ. सुमित्रा, संयुक्त निदेशक पशुपालन
Published on:
24 Jul 2023 11:20 am
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