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Story with Video: :जर्जर हो रही विरासत को संरक्षण की दरकार

श्रीमाधोपुर में सार-संभाल के अभाव में जर्जर हवेली

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सीकर

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Mukesh Kumawat

Nov 21, 2022

Story with Video: :जर्जर हो रही विरासत को संरक्षण की दरकार

Story with Video: :जर्जर हो रही विरासत को संरक्षण की दरकार

सीकर/श्रीमाधोपुर. श्रीमाधोपुर के सौंदर्य में चार चांद लगाने वाली ऐतिहासिक हवेलियां जर्जर होने से अपना मूल स्वरूप खो रही हैं। वर्षों से सूनी पड़ी हवेलियों के मालिक युवा पीढ़ी पुश्तैनी हवेलियों को लेकर सजग नहीं हैं। मालिकों की ओर से कुछेक हवेलियों की सारसंभाल होती हैं। बाकी हवेलियां सूनी पड़ी हैं और जर्जर होती जा रही है। जानकार बताते हैं कि यहां की हवेलियां बेजोड़ स्थापत्य कला का नमूना है और हवेलियों पर की गई बेजोड़ पेंटिंग विश्व विख्यात है। इन हवेलियों का निर्माण उस जमाने में सेठ-साहूकार शुभ मुहूर्त में शुरू कराते थे। काम शुरू होने पर छत, चौखट चढ़ाने, ढोला डाटते समय गुड़ बांटा जाता था। ज्यादातर हवेलियों में दो चौक बने हैं और दरवाजे के दोनों ओर चबूतरे, दरवाजे, आकर्षक नक्काशी खुदाई की चौखट, इन हवेलियों का आकर्षण है। इन हवेलियों का निर्माण ग्रेनाइट, सेंडस्टोन, चूना पत्थर आदि से किया गया है। कला के जानकार नहीं होने से कई हवेलियों पर सफेदी पोत दी गई। इसके चलते इनकी खूबसूरती खत्म हो गई। ऐतिहासिक चित्रों से सजी ये हवेलियां आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रही है। प्रशासनिक स्तर पर भी हवेलियों के रख रखाव को लेकर कोई कारगर कदम नहीं उठाए गए। इन हवेलियों की दीवारों पर अराईस बेहद चिकनी, आकर्षक तथा उच्चस्तरीय हैं। इनमें बनाए गए भित्ति-चित्रों में ब्रितानी दौर का आधुनिक-दृष्टिकोण स्पष्ट दिखाई देता हैं, वहीं पुरानी हवेलियों में हिन्दू-मुस्लिम स्थापत्य शैली का सुन्दर मिश्रण हैं। बाद की हवेलियों में ब्रिटिश शैली का प्रयोग अधिक किया गया हैं। हवेलियों में देवी-देवताओं के अंकन के साथ ही नीला-हरा-लाल गहरे रंगों का सम्यक रूपांकन हैं। यह बात और हैं कि प्रवासियों के लगातार मोहभंग होने तथा प्रशासन व जनप्रतिनिधियों के भी रुचि न लेने से ये धरोहरें (विशेषत: हवेलियां) खुर्दबुर्द हो रही हैं। युवा पीढ़ी बेशक जीके की बुक्स में सुप्रसिद्ध पंसारी की हवेली को पढ़ती हैं, लेकिन 90% युवा पीढ़ी को इसकी जानकारी नहीं है श्रीमाधोपुर में ये कहा है स्थित ?

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यूं तो श्रीमाधोपुर में भव्य तथा आकर्षक हवेलियों की संख्या काफी हैं किन्तु धीरे-धीरे व्यावसायिकता की चपेट में खुर्द-बुर्द होने से इनकी संख्या घटती जा रही हैं। वर्तमान में कस्बे में पंसारी की हवेली, मानपुरियो की हवेली (तीन-चौक की), खुशालीराम मिश्र की हवेली सहित अनेक हवेलियां आज भी इतिहास का गौरवगान करती हैं। पुरानी हवेलियों पर आकर्षक भीत्ति चित्र सैलानियों को भी लुभाते हैं। कस्बे की नायन का जोशी हवेली के बाहर चौक में तीज व गणगौर की सवारी आयोजन होता है। हवेलियां तोड़कर कॉम्प्लेक्स बनाए जा रहे हैं। सुप्रसिद्ध पंसारी की हवेली तो अब सिर्फ जीके की किताबों में ही सिमट कर रह गई है।