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आपदा में अवसर बनाम मौके की चूक…डा. सुरेन्द्र भास्कर

कोविड के रूप में वर्तमान पीढ़ी ने अपने जीवन की सबसे बड़ी विपदा देखी है। हर कोई आपदा में अवसर का ज्ञान दे रहा है पर कोई यह नहीं सोच रहा है कि प्रकृति ने मनुष्य को इस महामारी के बहाने सोचने का एक बेहतरीन मौका दिया था

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सीकर

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Sachin Mathur

Sep 13, 2020

आपदा में अवसर बनाम मौके की चूक...डा. सुरेन्द्र भास्कर

आपदा में अवसर बनाम मौके की चूक...डा. सुरेन्द्र भास्कर

कोविड के रूप में वर्तमान पीढ़ी ने अपने जीवन की सबसे बड़ी विपदा देखी है। हर कोई आपदा में अवसर का ज्ञान दे रहा है पर कोई यह नहीं सोच रहा है कि प्रकृति ने मनुष्य को इस महामारी के बहाने सोचने का एक बेहतरीन मौका दिया था पर तुच्छ स्वार्थ के चलते हम इससे चूक गए। हर कोई आपदा को अवसर के रूप में भुना रहा है फिर भी आर्थिक दर माईनस में जा रही है। भौतिकवाद के इस दौर में हम प्रकृति का लगातार दौहन करते जा रहे है। कोई कोरोना के आंकड़ों को छुपा रहा है तो कोई अर्थशास्त्री आर्थिक मंदी में अर्थव्यवस्था के भारी भरकम आंकड़ों से डरा रहा है। पुलिस प्रशासन ने शुरुआती 2 महीनों में डंडे के जोर पर अपने को कोविड के साथ तालमेल बैठाने के लिए बहुत समझाया लेकिन अब तो यह लगता है हम केवल डंडे की भाषा ही समझते है। एक सभ्य समाज के लोगों को स्वयं आगे आकर उदाहरण पेश करना चाहिए। काश हम अपने स्वास्थ्य और आगे आनी वाली पीढ़ी के भविष्य के लिए अपने पर संयम रखते हुए जिंदगी को थोड़ा नियमित कर ले। सोचो यदि बाजार खुलने का समय रोज सुबह 9 से शाम को 7 बजे तक हो जाये तो सभी व्यापारी अपने लाभ को परिवार के क्वालिटी टाइम के साथ एंजॉय कर सकेंगे। समय पर घर आने जाने से उनकी दिनचर्या स्वस्थ भी रहेगी और बाजार में अनुशासन का एक अच्छा संदेश भी जाएगा। लेकिन हम ऐसा नहीं करेंगे...क्या पता लेट आया कौन सा भगवान रूपी कस्टमर अपने को अधिक मुनाफ़ा दे जाय। लेकिन टिड्डी का मारा किसान मुनाफे से बहुत दूर अपने सर्वाइवल के लिए पैर पटक रहा है ऐसे में रात को बाजारी की सोचने वाला, दिन में आने के लिए भी पांच बार सोचेगा। यह तो केवल एक व्यापारी वर्ग का उदाहरण है लेकिन हम सभी उस अधिकतम सुख की चाहत में आज के सुख चैन को खोते जा रहे है। प्राइवेट बसों में वास्तविक किराये का 20 गुना अधिक पैसा वसूला जा रहा है। सैनिटाइजर को हम आज की बजाय कल इस्तेमाल करने के लिए छुपा रहे है। मास्क की शुरुआती लूट के बाद हम हाथ के बने देसी हृ95 में आत्मनिर्भर हो गए है लेकिन इस्तेमाल केवल चालान से बचने के लिए कर रहे है। संक्रमण के दौर में भी बहुत से साथी घर से बाहर मस्ती करने केवल इसलिए जा रहे है कि कल जब बिजनिस पटरी पर आ जायेगा तो इसके लिए समय नहीं मिलेगा। कल तक बड़े बड़े ज्ञानी जो बच्चों को मोबाइल से दूर रहने की सलाह दे रहे थे वो ऑनलाइन एजुकेशन के नाम पर बचपन में ही उन्हें तकनीकी का दास बना रहा है। कल तक घरवालों को अच्छा मोबाइल दिलाने के नाम पर डिप्रेशन में लाने वाले क्वारन्टीन हुए कुछ युवा चौबीसों घंटे हाथ मे मोबाइल होते हुए भी अपने आप को डिप्रेशन फील कर रहे है, वो बात और है कि डिप्रेशन की उनको मेरी तरह स्पेल्लिंग भी नहीं आती है। ऐसे वक्त में आज जब वास्तव में हमे सोशल डिस्टेनसिंग को मिटाने की जरूरत थी तब हमने फिजिकल डिस्टेंसिंग का एक नया अर्थ गढ़ लिया है। कुल मिलाकर वर्तमान में चारों और फैले वातावरण को देखते हुए कई बार लगता है कि लॉकडाउन अगर एक साल तक बढ़ जाये तो भी हम सुधरने वालों में से नहीं है। जरा सोचो एक बार....हम कहाँ से कहाँ जा रहे है। याद रखे हम यहां सब अलग अलग किरदार में टेम्परेरी मुसाफिर है। एक दिन यह भागदौड़ और लूट कसौट यहीं रह जानी है। मजाक और भय के आलम में औरों के आंकड़े देखते देखते हम 1 से बढ़कर 24 घंटो में 95 हजार तक पहुंच गए है। आओ कोरोना काल में हम सब मिलकर सरकारी गाइडलाइंस के साथ प्रकृति के मानक नियमों का भी पालन करे। अच्छी बातों को जीवन मे स्वीकार करे और शादी ब्याह एवं सामाजिक उत्सवों पर इक_ी होने वाली अनावश्यक भीड़ को कम करें। फालतू के ढकोसलों से बचें एवं सादगी को अपनाये। सकारात्मक सोच के साथ, दिन रात एक करने वाले कार्मिकों को सैल्यूट करे और सब कुछ बंद हो जाने के बाद भी अपना पेट लगातार भरवाने वाले किसान की खुशहाली की कामना करें। स्वस्थ रहे.......आबाद रहे।

लेखक सीकर में सहायक भू प्रबंध अधिकारी है।