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अकीदत से मन रही ईद, घरों में हुई नमाज

सीकर. जिले में ईद-उल-अजहा यानी बकरीद का पर्व बुधवार को अकीदत व एहतराम से मनाया जा रहा है।

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सीकर

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Sachin Mathur

Jul 21, 2021

अकीदत से मन रही ईद, घरों में हुई नमाज

अकीदत से मन रही ईद, घरों में हुई नमाज

सीकर. जिले में ईद-उल-अजहा यानी बकरीद का पर्व बुधवार को अकीदत व एहतराम से मनाया जा रहा है। सुबह की मुख्य नमाज के बाद से ही मुबारकबाद के साथ मुस्लिम मोहल्लों में कुर्बानी का दौर देखा जा रहा है। लोग एक दूसरे को गले मिलकर तो फोन पर संदेश या बात कर ईद की मुबारकबाद दे रहे हैं। इससे पहले कोरोना गाइडलाइन की पालना में लोगों ने ईद की मुख्य नमाज घर पर ही अता की। जामा मस्जिद सहित विभिन्न मस्जिदों में चुनिंदा लोगों की मौजूदगी में ही नमाज हुई। नगर परिषद सभापति जीवण खां ने ईद के त्योहार की मुबारकबाद देते हुए लोगों से कोरोना गाइडलाइन की पालना करते हुए ही त्योहार मनाने की अपील की है।

मुस्लिम मोहल्लों में बढ़ी रौनक
ईद के पर्व से मुस्लिम मोहल्लों में रोनक बढ़ गई है। सुबह से ही लोग नए कपड़ पहने एक दूसरे से मिलते व मुबारकबाद देते दिख रहे हैं। घर घर में कुर्बानी के साथ मिलनेवालों के आने- जाने का सिलसिला बना हुआ है। कोरोना महामारी को देखते हुए लोग सोशल डिस्टेंसिंग, मास्क व सेनिटाइजेशन का भी ध्यान रख रहे हैं।


इसलिए मनाई जाती है ईद
श्रीमाधोपुर के हनिश भाई व आबिद शेख ने बताया कि इस्लाम में ईद के त्योहार का बड़ा महत्व है। इस्लामिक कैलेंडर के मुताबिक ईद-उल-अज़हा 12वें महीने की 10 तारीख को मनाई जाती है। इसी महीने में हज यात्रा भी की जाती है। ईद-उल-फितर की तरह ईद-उल-अज़हा पर भी लोग मस्जिदों में नमाज़ अदा करते हैं। इस ईद पर कुर्बानी देने की खास परंपरा है। इस दिन पैगंबर हजरत इब्राहिम की याद में बकरे या बड़े जानवर की कुर्बानी दी जाती है। मान्यता है कि हजरत इब्राहिम को कई मन्नतों बाद एक औलाद पैदा हुई जिसका नाम उन्होंने इस्माइल रखा। एक रात ख्वाब में हजरत इब्राहिम से अल्लाह ने उनकी सबसे सबसे प्यारी चीज की कुर्बानी मांग ली। अल्लाह के हुक्म पर वह अपने बेटे की कुर्बानी देने को तैयार हो गए। बेटे की कुर्बानी देने के वक्त हजरत इब्राहिम ने अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली। कुर्बानी देने के बाद जब हजरत इब्राहिम ने अपने आंखों से पट्टी हटाई तो देखा कि उनका बेटा जिंदा था और बेटे की जगह अल्लाह ने एक दुंबे (एक जानवर) को कुर्बान कर दिया था। यहीं से इस्लाम में इस रवायत की शुरुआत हुई।