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भू-माफियाओं का इतना दुःसाहस कि सड़क पर कर डाला अतिक्रमण

शहर में यातायात में बाधक बन चुके अतिक्रमण को हटाने के लिए राजस्थान उच्च न्यायालय के आदेश पर जिला प्रशासन ने एक मॉनीटरिंग कमेटी गठित कर अतिक्रमण हटाने का अभियान चलाया लेकिन पिछले दिनों इस अभियान को एकाएक बंद कर दिया।

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सीकर

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pawan uppal

Jun 15, 2017

शहर में यातायात में बाधक बन चुके अतिक्रमण को हटाने के लिए राजस्थान उच्च न्यायालय के आदेश पर जिला प्रशासन ने एक मॉनीटरिंग कमेटी गठित कर अतिक्रमण हटाने का अभियान चलाया लेकिन पिछले दिनों इस अभियान को एकाएक बंद कर दिया। इस पर दुबारा अतिक्रमण करने की हौड़ एेसी मची कि अब सड़कों पर सरेआम कब्जे होने लगे है। विनोबा बस्ती पार्क के बाहर कुछ भू माफियों ने एेसा दुहस्सास किया कि सरेआम वहां पक्का निर्माण कर डाला।


आसपास बसे लोगों ने इसकी शिकायत नगर परिषद प्रशासन तक पहुंचाई लेकिन परिषद अमले ने इसे तोडऩे या रोकने की बजाय चुप्पी साध ली। नतीजन यह निर्माण सड़क पर इस कदर बन चुका है कि वहां इसे अब धार्मिक स्थल बताया जा रहा है। इसी कब्जे के पास बरगद के पुराने पेड़ के नीचे मंदिर भी बन चुका है। इस पार्क के मुख्य गेट के विपरीत साइड में पुरानी मूर्ति रखकर वहां पूजा अर्चना होने लगी। धीरे धीरे वहां अब मंदिर का रूप ले लिया है। इसी तरह नगर विकास न्यास क्षेत्र की संजय कॉलोनी में भी भू माफियों ने वहां कब्जा करना शुरू कर दिया। वहां सड़क किनारे इतने कब्जे हो गए है कि वहां अब आंगनबाड़ी केन्द्र भवन किराये पर संचालित होने लगा है। इधर, एसएसबी रोड पर भी कई लोगों में दुकानों और मकानों के आगे कब्जे की होड़ बनी हुई है।

पहले कब्जा फिर नियमन

शहर के कोडा चौक और भगतसिंह चौक क्षेत्र में सरकारी भूमि पर कई लोगों ने वहां दुकानों का निर्माण कर कब्जा कर लिया। इसके बाद नगर परिषद के तत्कालीन जिम्मेदार अधिकारियों ने बकायदा इन दुकानों का नियमन कर दिया। अब इन दुकानों की आड़ में एेसे नियमन अन्य स्थानों पर होने लगे है। यहां तक कि कोतवाली के पास स्थित सिविल लाइन्स एरिया में दुकानें बन गई। वहीं रेलवे स्टेशन रोड पर कई लोगांें ने पक्के निर्माण कर दुकानों का रूप दे दिया और परिषद से दस्तावेज भी बनवा लिए ताकि यह पूरी प्रक्रिया नियमन की तरह दिखे।

लगाया धरना फिर भी नहीं पड़ी पार

मिनी मायापुरी में कई दुकानों का निर्माण अनाधिकृत रूप से किया गया। संबंंधित दुकानदार ने करीब चालीस साल पुराने दस्तावेज आंदोलनकारियों को दिखाए तो उसमें ये दस्तावेज कम्प्यूटराइज्ड थे जबकि उस समय कम्प्यूटर से लीज नहीं बनाई जाती थी। कई लोगों ने संघर्ष समिति गठित कर विवादित दुकानों के आगे धरना भी लगाया। यहां तक कि स्थानीय विधायक कामिनी जिन्दल ने आकर इस इलाके में अवैध रूप से बनी दुकानों को हटाने का आश्वासन भी दिया था लेकिन नगर परिषद प्रशासन ने इसकी जांच के नाम पर खानापूर्ति कर दी कि यह मामला सुलझने की बजाय उलझ गया है। इस मामले की शिकायत लोकायुक्त तक पहुंच चुकी है। लेकिन अभी तक स्थिति ज्यों की त्यों है।

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