
राजस्थान में में धाक रखने वाले अस्पताल से सरकार की दूरी
एशिया में क्षय रोग से पीड़ितों को उपचार दिलाने के लिए अपनी धाक जमाने वाला सांवली का कल्याण आरोग्य सदन दो दशक से अपना अस्तित्व बचाने की कोशिश कर रहा है। दो दशक से अस्पताल को केन्द्र व राज्य सरकार की ओर से किसी प्रकार की आर्थिक मदद नहीं मिल रही है। जिससे अस्पताल का संचालन भामाशाहों की ओर से दी जाने वाली आर्थिक मदद के जरिए ही हो पा रहा है। ऐसे में टीबी के मरीजों को उपचार के निजी अस्पतालों की शरण लेनी पड़ रही है। हाल यह हो गया कि अस्पताल में अब सौ से कम मरीजों का उपचार हो रहा है जबकि शुरूआत में अस्पताल में विभिन्न राज्यों के करीब 400 से ज्यादा मरीज भर्ती रहते थे। जबकि अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती मरीज व परिजन के लिए प्रबंधन की ओर से दवा के साथ खाने व रहने की सुविधा निशुल्क मुहैया करवा रही है। गौरतलब है कि सीकर के रावराजा कल्याण सिंह ने सांवली में स्थित भूमि और अपनी ग्रीष्मकालीन कोठी और बाग बगीचों को टीबी रोग के उपचार के लिए कल्याण आरोग्य सदन को दी थी।
स्कॉटलैंड और चेकोस्लोवाकिया का झलक
गीतो और भीतों की धरती सीकर को पहचान दिलाने के लिए बद्री नारायण सोढ़ानी ने बीड़ा उठाया और प्रवासियों के सहयोग से सांवली में एशिया के सबसे बड़े टीबी अस्पताल की नींव सन1960 में रखी । टीबी के भवन का नक्शा और सहयोग स्कॉटलैंड व चेकोस्लोवाकिया के इंजीनियर ने तैयार किया था। उस समय अस्पताल में 415 बैड के लिए 26 वार्ड और नौ प्राइवेट कॉटेज बने हुए हैं। लम्बे चौड़े क्षेत्र में फैले इस अस्पताल की सबसे अच्छी बात आइसोलेटेड वातावरण है। क्षय रोगियों को बेहतर वातावरण मिले उसके लिए परिसर के बीच में नहर और हौज बनाए गए। लम्बे-चौड़े परिसर में मरीजों की सुविधा और आराम को देखते हुए अस्पताल में ब्रोंकोस्कॉपी, गेस्ट्रोस्कोपी, लेबोरट्री और आईसीयू और ऑपरेशन थियेटर की सुविधा है। जिसका उद्घाटन तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने 1964 में किया था।
इनका कहना है
कल्याण आरोग्य सदन में टीबी के मरीजों के लिए बरसों से सरकार की ओर से किसी प्रकार की सहायता राशि नहीं मिली है। हालांकि अब कल्याण आरोग्य सदन को चिरंजीवी योजना और प्रशिक्षण केन्द्र और जीएनएम सेंटर के जरिए कुछ राशि मिल रही है। जिससे कुछ राहत मिली है।
कांता प्रसाद मोर, मंत्री कल्याण आरोग्य सदन
Published on:
13 Apr 2023 11:59 am
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