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हर्ष में थी विश्व की दुर्लभतम लिंगोद्भव मूर्ति, आज भी अजमेर संग्रहालय में सुरक्षित

सचिन माथुर सीकर. हर्ष पर्वत पर्यटन के साथ आस्था का बड़ा केंद्र है। जहां हरियाली की ओट व प्रकृति की गोद में बसे भगवान शिव व भैरवनाथ को शीश नवाने हर साल हजारों श्रद्धालु इसके शिखर पर चढ़ते हैं।

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सीकर

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Sachin Mathur

Jul 14, 2022

सावन स्पेशल: हर्ष में थी विश्व की दुर्लभतम लिंगोद्भव मूर्ति, आज भी अजमेर संग्रहालय में सुरक्षित

सावन स्पेशल: हर्ष में थी विश्व की दुर्लभतम लिंगोद्भव मूर्ति, आज भी अजमेर संग्रहालय में सुरक्षित

सीकर. हर्ष पर्वत पर्यटन के साथ आस्था का बड़ा केंद्र है। जहां हरियाली की ओट व प्रकृति की गोद में बसे भगवान शिव व भैरवनाथ को शीश नवाने हर साल हजारों श्रद्धालु इसके शिखर पर चढ़ते हैं। पर शायद ही किसी को पता हो कि यहां भगवान शिव की सबसे दुर्लभ लिंगोद्भव की मूर्ति भी प्राप्त हो चुकी है। जो सृष्टि की उत्पति से संबंध रखती है। मूर्ति का पौराणिक व पुरातात्विक महत्व ऐसा है कि आज भी उस मूर्ति को अजमेर के संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया है। भगवान शिव के प्रिय सावन महीने की शुरुआत में आज हम आपको उसी मूर्ति का दर्शन हर्ष के इतिहास की जानकारी के साथ करवा रहे हैं।

विश्व की एकमात्र लिंगोद्भव मूर्ति
हर्ष मंदिर के निर्माण के समय इसमें पौराणिक महत्व की कई मूर्तियां प्रतिष्ठित की गई थी। जिनमेे एक मूर्ति लिंगोद्भव की भी थी। जिसमें शिवलिंग से ब्रम्हा, विष्णु व भगवान गणेश की उत्पत्ति का दृश्य दर्शाया गया है। जो धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सृष्टि के प्रारंभ का परिचय देती है। लिंगोद्भव की मूर्तियां यूं तो दक्षिण भारत के मंदिरों में देखने को मिलती है। लेकिन, इस आकार व रूप की यह विश्व की एकमात्र मूर्ति मानी गई है।

प्राचीन पंचाचन शिव भी है खास
हर्ष पर वर्तमान में विराजित भगवान शिव की पंचमुखी मूर्ति भी बेहद खास है। जो भी प्रदेश की सबसे प्राचीन शिव प्रतिमा मानी जाती है। पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु का मनोहारी किशोर रूप देखने के लिए भी भगवान शिव इस रूप में प्रकट हुए थे। वहीं, भगवान शिव के पांच मुंह पंचतत्व यानी जल, वायु, अग्नि, आकाश, पृथ्वी की उत्पत्ति व जगत कल्याण की कामना से विभिन्न कल्पों में हुए उनके सद्योजात, वामदेव, तत्पुरुष, अघोर और ईशान अवतार के प्रतीक भी माने जाते हैं।

चौहान वंश ने बनाया था मंदिर
प्रागैतिहासिक काल का शिव मंदिर संवत एक हजार में अजमेर सांभर के चौहान वंश के शासक सिंहराज के क्षेत्राधिकार में था। जय हर्षनाथ- जय जीण भवानी पुस्तक के लेखक महावीर पुरोहित लिखते हैं कि इस काल में रानोली का नाम रणपल्लिका था। यहां के एक ब्राह्मण सुहास्तु रोजाना पैदल चलकर इस पर्वत पर शिव आराधना किया करते थे। इन्हीं सुहास्तु के कहने पर राजा सिंहराज से हर्ष पर हर्षनाथ मंदिर निर्माण व वहां तक पहुंचने के लिए सुगम रास्ते की मांग की। इस पर महाराज सिंहराज ने विक्रम संवत 1018 में हर्षनाथ मंदिर की नींव रखी और पहाड़ की गोद में एक नगर बसाया। जिसका नाम हर्षा नगरी रखा गया। यही आज हर्ष गांव कहलाता है। इतिहासकार डा. सत्यप्रकाश ने इसे अनन्ता नगरी भी कहा। यहां सदा बहने वाली चंद्रभागा नदी भी थी। मंदिर का निर्माण सुहास्तु के सलाहकार सांदीपिता के मार्गदर्शन में वास्तुकार वाराभद्र ने वैज्ञानिक ढंग से किया था। मंदिर को बनने में 12 साल लगे। मंदिर की मूर्तियों, स्तंभ, तोरण द्वार व छतों का सारा काम संगीन पत्थरों के जोड़, खुदाई व कोराई से किया गया। पत्थर नागौर के छोटी खाटू गांव तथा मकराना व मध्यप्रदेश के मालवा व मेवाड़ से लाया गया। इसी बीच महाराजा सिंहराज व सुहास्तु दोनों की मृत्यु हो गई। इसके बाद चौहान राजा विग्रह ने संवत 1030 यानी सन 973 में मंदिर का निर्माण पूरा करवाया।

राव शिवसिंह ने बनवाया दूसरा मंदिर
औरंगजेब के आक्रमण के बाद संवत 1781 में हर्ष पर दूसरा शिव मंदिर बना। जिसे सीकर के शासक राव शिव सिंह ने महात्मा शिवपुरी के आदेश पर बनवाया था। कहा जाता है कि महात्मा शिवपुरी के आशिर्वाद से ही शिव सिंह का जन्म हुआ था।