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Kargil Vijay Diwas : जीतने की जिद से ‘खिलाड़ी’ ने तबाह की थी पाकिस्तान की तीन चौकियां, पढ़ें शहीद जांबाज की दास्तां

Kargil Vijay Diwas : शहीद सीताराम कुमावत ( Martyr Sitaram Kumawat ) ने 18 ग्रेनेडियर की अपनी टीम के साथ द्रास सेक्टर में दुश्मन की तीन चौकियों को तबाह किया। चौथी चौकी फतेह करने आगे बढ़ा ही था कि दुश्मन की मिसाइल का शिकार होकर शहीद हो गया।

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Kargil Vijay Diwas : शहीद सीताराम कुमावत ( Martyr Sitaram Kumawat ) ने 18 ग्रेनेडियर की अपनी टीम के साथ द्रास सेक्टर में दुश्मन की तीन चौकियों को तबाह किया। चौथी चौकी फतेह करने आगे बढ़ा ही था कि दुश्मन की मिसाइल का शिकार होकर शहीद हो गया।

Kargil Vijay Diwas : जीतने की जिद से ‘खिलाड़ी’ ने तबाह की थी पाकिस्तान की तीन चौकियां, पढ़ें शहीद जांबाज की दास्तां

विनोद सिंह चौहान, सीकर.

Kargil Vijay Diwas : उसे बचपन से बास्केटबॉल से दीवानगी की हद तक प्यार था। इसी की बदौलत जब खेल कोटे से सेना में भर्ती हुआ था तभी से देशभक्ति की भावना उसके दिलों में हिलौरें लेती रही। ऑपरेशन विजय ( Operation Vijay ) के दौरान पाकिस्तानी घुसपैठियों के खिलाफ बास्केटबाल के खेल की तरह शहीद सीताराम कुमावत के ‘मल्टीपल थ्रो’ ने दुश्मनों के छक्के छुड़ा दिए। ‘मल्टीपल थ्रो’ में विरोधी के फाउल किए जाने पर उसी समय खिलाड़ी का अनेक फ्री थ्रो दिए जाते हैं। इन्हें मल्टीपल थ्रो या कई बार गेंद फेंकने की अनुमति दिया जाना भी कहा जाता है।


18 ग्रेनेडियर की अपनी टीम के साथ द्रास सेक्टर में दुश्मन की तीन चौकियों को तबाह किया। ( Destroyed Three Posts of Pakistan ) चौथी चौकी फतेह करने आगे बढ़ा ही था कि दुश्मन की मिसाइल का शिकार होकर शहीद हो गया। देश का यह बहादुर बेटा आज भले ही हमारे बीच नहीं है लेकिन उसकी बहादुरी के किस्से आज भी हर किसी की जुबान पर है।

वे आज भी जिंदा हैं
करगिल का रण जीतने वाले शहीद के घर जब पत्रिका की टीम पहुंची तो वीरांगना सुनीता देवी की आंखों में शहीद पति की विरह के अश्क फूट पड़े। कांपते होठों से बार-बार यही कहतीं कि वो आज भी जिंदा है। वीरांगना अपना सुख-दुख शहीद की प्रतिमा से सांझा करती हैं। शहीद का सपना था कि उनकी दोनों बेटियां भी देश सेवा में नाम कमाए और वीरंगना भी उसी सपने को पूरा करने में जुटी हुई हैं। गांव में बना शहीद स्मारक सीताराम की याद को जिंदा रखे हुए है।


पिता की आंखें नम
पलसाना गांव के शहीद बेटे सीताराम कुमावत की बात करते ही पिता की आंखें नम हो जाती हैं। उन्हें याद आता है कि कैसे बीस साल पहले उनका लाडला तिरंगे में लिपटा घर लौटा था। वे बताते हैं कि बास्केटबाल का राष्ट्र स्तरीय खिलाड़ी बनने के बाद 27 अप्रेल 1993 को सेना में भर्ती हुआ तो आंखों में बरसों से पल रहा सपना पूरा हुआ। वे बताते हैं कि सीताराम शुरू से ही विरोधी टीम को हराने के लिए सारे पैंतरे बखूबी आजमाता और वैसा ही उसने करगिल युद्ध में किया।