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मुंबई से खाटूश्यामजी की 11 पैदल यात्रा की, जिन आदिवासी गांवों से गुजरे वहां भी पूजे जाने लगे बाबा श्याम

सीकर/खाटूश्यामजी. एक कहावत है जैसा रहे संग, वैसा चढ़े रंग। अमूमन ये अच्छी- बुरी संगति से किसी व्यक्ति में आए बदलाव के लिए कही जाती है।

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सीकर

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Sachin Mathur

Nov 26, 2020

मुंबई से खाटूश्यामजी की 11 पैदल यात्रा की, जिन आदिवासी गांवों से गुजरे वहां भी पूजे जाने लगे बाबा श्याम

मुंबई से खाटूश्यामजी की 11 पैदल यात्रा की, जिन आदिवासी गांवों से गुजरे वहां भी पूजे जाने लगे बाबा श्याम

सीकर/खाटूश्यामजी. एक कहावत है जैसा रहे संग, वैसा चढ़े रंग। अमूमन ये अच्छी- बुरी संगति से किसी व्यक्ति में आए बदलाव के लिए कही जाती है। लेकिन, अब ये कहावत एक पूरे गांव को बदलने के रूप में कही जा रही है। ये गांव राजस्थान व गुजरात के वे आदिवासी गांव है जहां कभी किसी ने खाटूश्यामजी का नाम तक नहीं सुना था। पर जब दांतारामगढ़ निवासी चंद्र प्रकाश ढांढण ने बाबा श्याम का ध्वज हाथ में लेकर खाटूश्यामजी (Khatushyamji) की मुंबई से एक के बाद एक 11 पैदल यात्राएं इन गांवों से गुजरते हुए की तो इन गांवों में भी बाबा श्याम में आस्था की अलख जग गई। (khatuShyam worshiping started in tribal villages) आलम ये है कि इन आदिवासी गांवों के कई मकानों में जहां बाबा श्याम की पूजा होने लगी है। वहीं, ये लोग अब बाबा श्याम के दर्शनों के लिए खाटू भी पहुंचने लगे हैं।

यूं जगी अलख

गुजरात के महिसागर जिले के मलिकपुर कस्बे के नानीराठ, मीरापुर और मोटाराठ गांव जो आदिवासी बाहुल्य है। ये गांव राजस्थान की सीमा के पास बसे हुए है। यहां के लोग एक साल पहले बाबा श्याम के बारे में कुछ भी नहीं जानते थे। मगर शेखावाटी के ढांढण गांव के चंद्रप्रकाश द्वारा मुंबई से खाटूधाम की पदयात्रा के दौरान आदिवासी क्षेत्र के घने जंगलों से गुजरते देख यहां के पुजारी और आदिवासियों के गुरू वीराभाई द्वारा उनसे पूछने पर यात्रा सहित बाबा श्याम के इतिहास के बारे में बताया। इसके बाद फाल्गुन मेले से पहले पुजारी सहित कुछ लोगों ने खाटूधाम आकर बाबा के दरबार में आये और शीश नवाकर यहां से बाबा श्याम की तस्वीर अपने गांव लेजाकर मंदिर में स्थापित कर दी। लोगों की कामना पूरी होने के बाद लोगों में श्याम के प्रति एसी अलख जगी की आज उस क्षेत्र के लोग लखदातार के मुरीद हो गए।

मुरादें हुई पूरी, बाबा पर जबर्दस्त आस्था

खाटूधाम से आकर पुजारी ने वहां के लोगों में बाबा श्याम का प्रचार प्रसार किया। लोगों ने वहां के मंदिर में आकर लखदातारी श्याम से कामना की और जब वह पूरी हुई तो उनके प्रति विश्वास और ज्यादा हो गया। कई लोगों के काम पूरे होने पर आज आदिवासी गांव बाबा श्याम को मानने लग गए है।


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