
कौन हैं बाबा खाटू श्याम, जानिए खाटूश्यामजी का इतिहास
खाटूश्यामजी (सीकर). बाबा श्याम। हारे का सहारा। लखदातार। खाटूश्यामजी। नीले घोड़े का सवार। मोर्वी नंदन। खाटू नरेश और शीश का दानी। जितने निराले बाबा श्याम के नाम और भक्त है, उतनी ही रोचक उनकी कथा व इतिहास है। खाटू मेले 2024 के मौके पर जानिए राजस्थान के सीकर जिले के गांव खाटू के नरेश खाटूश्यामजी को पूरी दुनिया में शीश के दानी के नाम से भी क्यों जाना जाता है? कौन हैं खाटूश्यामजी? कैसे बने बाबा श्याम? खाटूश्यामजी की पौराणिक कथा क्या है?
खाटूश्यामजी की कथा
-कौरव वंश के राजा दुर्योधन ने निर्दोष पाण्डवों को सताने और उन्हें मारने के लिए लाक्षागृह का निर्माण किया था, पर सौभाग्यवश वे उसमें से बच निकले और वनवास में रहने लगे।
-एक समय जब वे वन में सो रहे थे उस स्थान के पास ही एक हिडम्ब नामक राक्षस अपनी बहन हिडिम्बी सहित रहता था। जब उनको मनुष्य (पाण्डवों) की गंध आई तो उन्हें देखकर यह राक्षस अपनी बहन से बोला इन मनुष्यों को मारकर मेरे पास ले आओ।
-अपने भाई के आदेश से वह वहां गई जहां सभी भाई पत्नी द्रोपदी सहित सो रहे थे। और भीम उनकी रक्षा में जग रहा था। भीम के स्वरूप को देखकर हिडिम्बा उस पर मोहित हो गई। वह मन में उनसे विवाह के बारे में सोचने लगी।
-उसने भाई की परवाह किए बिना भीम को पति मान लिया। कुछ देर बाद हिडिम्बा के वापस न लौटने पर हिडिम्बासुर वहां आया और स्त्री के सुन्दर भेष में अपनी बहन को भीम से बात करता देख क्रोधित हुआ।
-इसके बाद हिडिम्बी के अनुनय विनय से माता कुन्ती व युधिष्ठिïर के निर्णय से दोनों का गन्धर्व विवाह हुआ। कुछ समय बाद हिडिम्बा गर्भवती हुई और एक महाबलवान पुत्र को जन्म दिया। बाल रहित होने से बालक का नाम घटोत्कच रखा गया।
-हिडिम्बा ने कहा कि मेरा भीम के साथ रहने का समय समाप्त हो गया है और आवश्यकता होने पर पुन: मिलने के लिए कह वह अपने अभिष्ठï स्थान पर चली गई। साथ ही घटोत्कच भी सभी को प्रणाम कर आज्ञा लेकर उतर दिशा की और चला गया।
-जल्द ही कृष्ण के कहने पर मणिपुर में मुरदेत्य की लडक़ी कामकंटका से गन्धर्व विवाह हुआ व कुछ समय व्यतीत होने के पश्चात उन्हें महान पराक्रमी पुत्र को जन्म दिया। जिसके शेर की भांति सुन्दर केशों को देखकर उसका नाम बर्बरीक रखा गया।
-बल की प्राप्ति के लिए उसने देवियों की निरन्तर आराधना कर तीनों लोको में दुर्लभ अतुलनीय बल का वरदान पाया। देवियों ने बर्बरीक को कुछ समय वहीं निवास करने के लिए कहा और कहा कि एक विजय नामक ब्राह्मïण आएंगे। उनके संग में तुम्हारा और अधिक कल्याण होगा।
-आज्ञानुसार बर्बरीक वहां रहने लगा। तब मगध देश के विजयी नामक ब्राह्मïण वहां आये और सात शिव लिंगों की पूजा के साथ ही विद्या की सफलता के लिए देवियों की पूजा की। ब्राह्मïण को स्वप्न में आकर कहा कि सिद्घ माता के सामने आंगन में साधना करो तो बर्बरीक तुम्हारी सहायता करेगा।
-ब्राह्मïण के आदेश से बर्बरीक ने साधना में विघ्न डालने वाले सभी राक्षसों को यमलोक भेज दिया। उन असुरों को मारने पर नागों के राजा वासुकि वहां आए और बर्बरीक को दान मांगने के लिये कहा।
-तब बर्बरीक ने विजय की निर्विघ्न तपस्या सफल होने का वर मांगा। ब्राह्मïण की तपस्या सफल होने पर उसने बर्बरीक को युद्घ में विजयी होने का वरदान दिया।
-कुछ काल बीत जाने के बाद कुरूक्षेत्र मैदान में कौरवों और पाण्डवों के बीच में युद्घ की तैयारियां होने लगी। इस अवसर पर बर्बरीक भी अपने तेज नीले घोड़े पर सवार होकर आ रहे थे।
-तब रास्ते में ही भगवान श्री कृष्ण बर्बरीक की परीक्षा लेने के लिए ब्राह्मïण के भेष में उसके पास पहुंचे। भगवान ने बर्बरीक की मन की बात जानने के लिए उससे पूछा कि तुम किसकी और से युद्घ लडऩे आए हो? इस पर बर्बरीक ने कहा कि वह कमजोर पक्ष की तरफ से युद्ध लड़ेगा।
-श्रीकृष्ण ने परीक्षा लेना चाहा तो बर्बरीक ने कहा कि सामने वाले पीपल वृक्ष के सभी पत्ते एक बाण से ही भेद देगा।
- इस पर श्रीकृष्ण ने पैर के नीचे दो पत्ते छिपा कर बर्बरीक को बाण चलाने को कहा। इसके बाद बर्बरीक ने एक बाण से क्षण भर में पेड़ के सब पत्ते भेद दिए। जब श्रीकृष्ण ने पैरों के नीचे के पत्ते देखे तो वह भी बिधे हुए दिखे।
-तब ब्राह्मïण बने श्रीकृष्ण ने बर्बरीक से युद्ध में पांडवों को खतरा समझ उससे दान की याचना की।
-बर्बरीक द्वारा दान का प्रण करने पर श्रीकृष्ण ने बर्बरीक से शीश का दान मांग लिया।
-यह सुनकर बर्बरीक स्तब्ध रह गए और बोले मैं अपना वचन सहर्ष पूरा करूंगा पर सत्य कहो आप कौन हो? तब कृष्ण ने अपना विराट स्वरूप बताते हुए कहा कि मैंने यह सोचा कि यदि तुम युद्घ में भाग लोगे तो दोनों कुल पूर्णतया नष्टï हो जाएंगे।
-तब बर्बरीक ने कहा कि आप मेरा शीश का दान तो ले लीजिए पर मेरी एक इच्छा है कि मैं युद्घ को आखिर तक देख सकूं। तब भगवान ने कहा कि तुम्हारी यह इच्छा पूरी होगी। तब बर्बरीक ने अपना शीश धड़ से काटकर दे दिया।
-शीश को अमृत जडिय़ों के सहारे पहाड़ के ऊंचे शिखर पीपल वृक्ष पर स्थापित कर दिया। 18 दिन तक चले युद्घ में पाण्डवों को विजय प्राप्त हुई।
- पर युद्ध जीतने पर पांडवों को घमण्ड हो गया तब श्रीकृष्ण उन सबको बर्बरीक के शीश के पास ले गए। जहां पांडवो द्वारा अपनी-अपनी वीरता का बखान करने पर बर्बरीक ने कहा कि आप सबका घमण्ड करना व्यर्थ है। जीत श्री कृष्ण की वजह से मिली है। मुझे तो इस युद्घ में श्री कृष्ण का सुदर्शन चक्र ही चलता नजर आया था। इसके बाद बर्बरीक चुप हो गए और आकाश से फूलों की वर्षा होने लगी। तब भगवान कृष्ण ने प्रसन्न होकर बर्बरीक को वरदान दिया कि कलियुग में तुम मेरे श्याम नाम से पूजे जाओगे और तुम्हारे सुमिरन से सभी मनोरथ पूर्ण होंगे।
Updated on:
11 Mar 2024 07:36 pm
Published on:
11 Mar 2024 07:33 pm
बड़ी खबरें
View Allसीकर
राजस्थान न्यूज़
ट्रेंडिंग
