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शादी की खुशियां हो या फाल्गुन का खुमार। गणगौर सरीखे त्यौहार हो या घरेलू नेगचार। लोकगीतों के बिना ना तो परंपराओं में जान रहेगी, ना ही किसी रीति रिवाज में मिठास। इसी भावना को दिल में संजोए भैंरुपुरा स्कूल के व्याख्याता रामदेव सिंह भामू 23 साल से ज्यादा गांव- गांव हमारी संस्कृति में रचे बसे इन गीतों की स्वर लहरियां बिखेर रहे हैं।
खास बात ये है कि प्रदेशभर में अपनी सुरीली आवाज का लोहा मनवा चुके भामू गीत भी महिला की आवाज और किरदार में ही गाते हैं। जिससे एकबारगी तो सुनने वाला हर शख्स उनके महिला होने का धोखा खा बैठते हैं। कला जत्थे में शामिल रह चुके भामू कई जिला स्तरीय अवार्ड हासिल कर चुके हैं।
हर मौसम, हर त्योहार के गीत याद
भामू हर त्योहार, रीति रिवाज और लोक देवताओं के गीत गाते हैं। फाल्गुन व सावन के गीत हो या शादी में बन्ना-बन्नी, चाक भात या विदाई गीत। गोगाजी व तेजाजी के गीत हो या रातीजगा व गणगौर के गीत। सभी के गीत वे पूरी लय और ताल में बेखटके गाते हैं।
यहां दिए कार्यक्रम
भामू लोक गीतों की प्रस्तुतियां सीकर के अलावा, चूरू, झुंझुनूं, बीकानेर व नागौर सरीखे कई जिलों में दे चुके हैं। बकौल भामू अकेले सीकर जिले में वे अब तक 700 गांवों में अपना कार्यक्रम कर चुके हैं। जिनका सबका रिकॉर्ड तक उनके पास सुरक्षित है। जागरण व स्नेह मिलन आदि में तो उनकी प्रस्तुतियां आम है।
बहन से मिली प्रेरणा
बकौल भामू लोक गीतों में उनकी रुची बड़ी बहन की वजह से हुई। बहन को सभी तरह के गीत आने के चलते गली मोहल्लों के हर कार्यक्रम में उनकी बहुत मांग थी। उनके साथ रहने से ही उनका भी लोक गीतों में रुझान बढ़ गया। गांव की चौपाल में गीत गाते-गाते अब प्रदेशभर में कार्यक्रम कर रहे हैं।
गीतों को करेंगे लिपिबद्ध
भामू बताते हैं कि लोकगीतों में जीवन का आनंद छुपा है। लेकिन, इनका प्रचलन धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। एेसे में आने वाली पीढि़यों तक इन्हें पहुंचाने के लिए वे गीतों को लिपिबद्ध करना चाहते हैं। जिसके लिए वे जल्द ही काम शुरू करेंगे।
Published on:
09 Apr 2016 12:36 pm
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