
सीकर के इस पर्वत पर भगवान शिव ने किया था राक्षसों का संहार
सीकर. नगर से 16 किमी दूर दक्षिण में हर्ष पर्वत स्थित है जो अरावली पर्वत श्रृंखला का भाग है। हर्ष पर्वत की ऊंचाई समुद्र तल से लगभग 3100 फीट है जो राजस्थान के सर्वोच्च स्थान आबू पर्वत से कुछ कम है।
इस पर्वत का नाम हर्ष एक पौराणिक घटना के कारण पड़ा। दुर्दान्त राक्षसों ने स्वर्ग से इन्द्र व अन्य देवताओं का बाहर निकाल दिया था। भगवान शिव ने इस पर्वत पर इन राक्षसों का संहार किया था। इससे देवताओं में अपार हर्ष हुआ और उन्होंने शंकर की आराधना व स्तुति की। इस प्रकार इस पहाड़ को हर्ष पर्वत एवं भगवान शंकर को हर्षनाथ कहा जाने लगा।
हर्ष जीणमाता का भाई
एक पौराणिक दन्त कथा के अनुसार हर्ष को जीणमाता का भाई माना गया है। हर्ष पर्वत पर भगवान शंकर का प्राचीन व प्रसिद्ध हर्षनाथ मंदिर पूर्वाभिमुख है तथा पर्वत के उत्तरी भाग के किनारे पर समतल भू-भाग पर स्थित है। हर्षनाथ मंदिर से एक महत्वपूर्ण शिलालेख प्राप्त हुआ था, जो अब सीकर के राजकुमार हरदयाल सिंह राजकीय संग्रहालय में रखा हुआ है। काले पत्थर पर उत्र्कीण 1030 वि.सं. (973 ई.) के शिलालेख की भाषा संस्कृत और लिपी विकसित देवनागरी है। इसमें चौहान शासकों की वंशावली दी गई है। इसमें हर्षिगरी, हर्षनगरी तथा हर्षनाथ का भी विवरण दिया गया है। मंदिरों के अवशेषों पर मिला एक शिलालेख बताता है कि यहां कुल 84 मंदिर थे। यहां स्थित सभी मंदिर खंडहर अवस्था में हैं, जो पहले गौरवपूर्ण रहे होंगे।
दर्शनीय है यहां चित्रकारी
कहा जाता है कि 1679 ई. में मुगल बादशाह औरंगजेब के निर्देशों पर सेनानायक खान जहान बहादुर द्वारा जानबूझकर इस क्षेत्र के मंदिरों को नष्ट व ध्वस्त किया गया था। मंदिर की दीवार व छतों पर की गई चित्रकारी दर्शनीय है। पुरातत्व विभाग द्वारा हर्ष पर्वत के सभी प्राचीन मंदिरों का संरक्षण प्राचीन संस्मारक एवं पुरावशेष स्थल अधिनियम 1985 के तहत किया जा रहा है।
Published on:
17 Jun 2019 06:17 pm
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