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inspirational: जिस क्रिकेट मैदान पर मां ने मजदूरी की, उसी पर खेलकर निशा ने राजस्थान टीम में बनाई जगह

सीकर. मेहनत व कुछ कर गुजरने का माद्दा हो तो मुकाम तक पहुंचने से कोई नहीं रोक सकता। शहर की राधाकिशनुपरा निवासी निशा सैनी इस बात की नायाब नजीर है।

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सीकर

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Sachin Mathur

Feb 19, 2023

inspirational: जिस क्रिकेट मैदान पर मां ने मजदूरी की, उसी पर खेलकर निशा ने राजस्थान टीम में बनाई जगह

inspirational: जिस क्रिकेट मैदान पर मां ने मजदूरी की, उसी पर खेलकर निशा ने राजस्थान टीम में बनाई जगह

सीकर. मेहनत व कुछ कर गुजरने का माद्दा हो तो मुकाम तक पहुंचने से कोई नहीं रोक सकता। शहर की राधाकिशनुपरा निवासी निशा सैनी इस बात की नायाब नजीर है। जिसकी मां कभी क्रिकेट एकेडमी के मैदान में साफ- सफाई व मजदूरी का काम करती थी। उसी मैदान को अपनी मंजिल का मार्ग बनाकर निशा ने अपनी लेग स्पिन का ऐसा जादू बिखेरा कि महज 17 साल की उम्र में ही उसका चयन राजस्थान की सीनियर टीम में हो गया।

18 विकेट लेकर खींचा ध्यान
बीए फस्र्ट ईयर की छात्रा निशा बॉल को बेहतरीन लेग स्पिन करवाती है। पिछले साल आरसीए की सीनियर महिला स्टेट चैंपियनशिप, सीनियर टी-20 चैलेंजर ट्रॉफी व संभावित कैंप के मैच में उसने सबसे ज्यादा 18 विकेट हासिल कर चयनकर्ताओं को ध्यान खींचा। जिसके चलते ही उसका चयन कम उम्र में भी सीनियर टीम में कर लिया गया।

लडक़ों के साथ खेलने पर समाज ने बनाया दबाव
निशा ने 10 साल की उम्र में ही क्रिकेट खेलना शुरू कर दिया था। अभावों से जूझते परिवार से निकलकर लडक़ों के साथ क्रिकेट खेलते देखा तो समाज ने भी खेल छोडऩे का खूब दबाव बनाया। पर अपने संकल्प पर अडिग निशा क्रिकेट के मैदान पर डटी रही। इस पर निशुल्क कोचिंग के साथ कोच संदीप सैनी ने भी पूरा सहयोग दिया। आस्ट्रेलियाई पूर्व क्रिकेटर शेनवार्न को अपना आदर्श मानने वाली निशा का लक्ष्य अब भारतीय क्रिकेट टीम में जगह बनाकर देश का नाम रोशन करना है।

माता- पिता दोनों मजदूर
निशा के माता- पिता दोनों मजदूरी करते हैं। पिता सुरेंद्र सैनी कपड़ों की दुकान पर सेल्समैन तो मां मंजू देवी खेत में मजदूरी करती है। राधाकिशनपुरा स्थित आरआर क्रिकेट एकेडमी में घास आदि की साफ सफाई सरीखे काम भी उन्होंने मजदूरी पर ही किए। जहां से ही बेटी निशा ने अपनी मंजिल की तरफ कदम बढ़ाया।

खुद की क्रिकेट सिखाने की मांग
बकौल कोच संदीप निशा ने 9 साल की उम्र में ही क्रिकेट खेलना शुरु कर दिया था। स्कूल में पढ़ते समय ही वह क्रिकेट मैच देखने मैदान पर आती थी। जहां चौके- छक्के लगने पर वह खूब रोमांचित होती। इसी बीच एक दिन उसने भी क्रिकेट खेलने की मंशा जाहिर की। जिसके बाद उन्होंने उसे पांच से छह घंटे निशुल्क कोचिंग देना शुरू किया।

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