
35 साल लोगों को साक्षर करने वाले 50 हजार प्रेरक बेरोजगार
सीकर. प्रदेश में साक्षरता की अलख जगाने वाले प्रेरक अब खुद अंधरे में है। वर्षो तक कम मानदेय पर काम करने वाले प्रेरकों को सरकार ने आश्वासन देकर योजना से दूर कर दिया। अब दो साल बाद भी इनके रोजगार की भी सरकार कोई व्यवस्था नहीं कर सकी है। साक्षर भारत मिशन के तहत प्रदेशभर में 17 हजार साक्षरता प्रेरक कार्यरत थे। सरकार ने बोनस अंकों की भर्ती में समायोजित करने का भी आश्वासन दिया। लेकिन प्रदेश में एक भी प्रेरक को सरकार स्थायी रोजगार नहीं दे सकी। रोजी-रोटी की मजबूरी में कई प्रेरकों के सामने मजदूरी करने की भी नौबत आ गई है। प्रेरकों का कहना है कि वर्षो तक न्यूनतम मानेय पर काम करने के बाद भी सरकार की ओर कोई भत्ता नहीं दिया जा रहा है। हालांकि सरकार ने वर्ष 2021 से फिर से इस योजना को शुरू कर दिया। लेकिन प्रेरकों को इस योजना से पूरी तरह आऊट कर दिया है। अब साक्षरता विभाग शिक्षा विभाग के पीईईओ के जरिए इस योजना को आगे बढ़ाने की तैयारी में है। इस वजह से प्रदेशभर के प्रेरकों में सरकार के खिलाफ काफी गुस्सा है। दूसरी तरफ कई जिलों में प्रेरकों का बकाया मानदेय भी नहीं दिया गया है।
प्रेरकों का दर्द: अब ओवरएज, नहीं कर पा रहे भर्तियों की तैयारी
केस एक: आयु सीमा में मिले छूट, सैकड़ों प्रेरकों को इंतजार
्रपे्ररक सुनंदा ने बताया कि कक्षा बारहवीं से ही निरक्षरता को दूर करने का जुनून सवार हो गया। एमए-बीएड होने के बाद भी साक्षरता केन्द्र में प्रेरक बन गई। अब सरकारी भर्तियों से ओवरएज होने की वजह से किसी भी शिक्षक भर्ती की तैयारी नहीं कर पा रही है। उनका कहना है कि सरकार ने नियमित नहीं किया कोई बात नहीं। लेकिन अब ओवरएज वाले अभ्यर्थियों को आयु सीमा में तो छूट देनी चाहिए। उनका कहना है कि प्रदेश के सैकड़ों प्रेरकों को सरकार के इस फैसले से राहत मिल सकती है।
केस दो: कोई निजी स्कूल में पढ़ाने पर मजबूर, कोई गया परदेस
सीकर निवासी प्रेरक मुकेश व अशोक कुमार ने बताया कि उन्होंने साक्षरता विभाग की योजनाओं में चार साल तक काम किया। समय पर मानदेय नहीं मिला। ऐसे में अब मजबूरी में निजी स्कूल में पढ़ा रहे हैं। इसी तरह प्रेरक श्रवण व आसिफ यहां से रोजगार छीनने पर कमाई के लिए परदेस चले गए। इसके अलावा कई प्रेरक वापस परिवार के साथ खेती के काम में लग गए है।
2009 में शुरू हुई थी साक्षर भारत योजना
8 सितम्बर 2009 को प्रदेश में कोटा को छोड़कर सभी जिलों में साक्षर भारत अभियान लागू किया गया। इस योजना में 2001 की जनगणना को आधार माना गया। इसके तहत प्रदेश के 17 हजार प्रेरकों ने 7500 लोक शिक्षा केंद्र पर नौ साल तक असाक्षर महिला पुरुषों को साक्षर करने का काम किया। 30 मार्च 2018 को इस अभियान को बंद कर दिया गया। वहीं प्रेरकों को भी मानदेय सेवा से पृथक कर दिया गया।
1985 से कर रहे थे काम
प्रदेश में निरक्षरता के कलंक को मिटाने के लिए 1985 में प्रौढ़ शिक्षा योजना लाई गई थी। फिर इसके स्थान पर अनौपचारिक शिक्षा योजना शुरू की गई। इस दौरान प्रेरकों को 105 रुपए मासिक मानदेय दिया जाता था। 31 मार्च 2001 में इसे बंद कर सतत शिक्षा और साक्षरता कार्यक्रम शुरू किया गया। इसके लिए प्रदेश में साक्षरता केंद्र बनाकर प्रेरकों और सह प्रेरकों को लगाया गया।
2003 में पुस्तकालयों की जिम्मेदारी का वादा
वर्ष 2003 में ग्राम पंचायतों में सरकार की ओर से महात्मा गांधी सार्वजनिक पुस्तकालयों की शुरुआत की गई थी। इस दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री ने इन पुस्तकालयों की जिम्मेदारी प्रेरकों को देने की बात कही थी। लेकिन अब पुस्तकालयों में पंचायतों ने अपने स्टाफ को लगा दिया। इस वजह से साक्षरता विभाग के प्रेरक यहां से भी आऊट हो गए।
सरकार नहीं निभा रही वादा, टूटी आस
सभी सरकारों ने साक्षरता प्रेरकों के साथ धोखा करने का काम किया है। पहले प्रेरकों को विभिन्न पदों की भर्तियों में बोनस अंक देकर स्थायी करने का वादा किया था। प्रदेश के ज्यादातर प्रेरक ओवरएज हो गए है। ऐसे में प्रेरक की स्थायी नौकरी की आस टूट गई है। प्रदेश में साक्षरता की अलख जगाने वालों के साथ सरकार को न्याय करना चाहिए।
किशनाराम बिजाराणियां, जिलाध्यक्ष, जिला प्रेरक संघ
Updated on:
21 Apr 2022 03:39 pm
Published on:
21 Apr 2022 03:37 pm
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