
शेखावाटी यानी धर्म की वाटी, ये हैं प्रमुख 24 धार्मिक स्थल
सीकर. शेखावाटी सेठों, शिक्षा व सैनिकों ही नहीं, आस्था की भी वाटी है। भक्ति रस की गंगा यहां पग- पग पर बहती है। जिनमें डुबकी लगाने के लिए देशभर से श्रद्धालु पहुंचते हैं। पत्रिका के सीकर संस्करण के 24 वें स्थापना दिवस पर आज हम आपको ऐसे ही 24 प्रमुख धार्मिक स्थलों के बारे में बताने जा रहे हैं, जहां श्रद्धा की बयार हर समय बहती है।
1. खाटूश्यामजी:
सीकर की दांतारामगढ़ तहसील में बसा खाटूश्यामजी मंदिर देश के प्रमुख आस्था केंद्रों में शामिल है। भगवान श्रीकृष्ण से उन्हीं के श्याम रूप में पूजे जाने का आशीर्वाद पाने वाले बर्बरीक के इस मंदिर की आधारशिला 1720 में रखी गई थी। कथाओं के अनुसार मंदिर वाले स्थान पर कभी गायें चरती थी। एक समय एक गाय के अपने आप दूध दिए जाने की घटना पर जब वहां खुदाई हुई तो बाबा श्याम महाभारतकालीन बर्बरीक के सिर के रूप में भूमि में समाये दिखे। जिन्हें वहीं मंदिर बनाकर प्रतिष्ठित किया गया। आज इस मंदिर में विश्वभर से श्रद्धालु पहुंचते हैं। श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या को देख खाटूश्यामजी मंदिर व कस्बे में विकास कार्य प्रगति पर है।
2. शाकंभरी:
सीकर- झुंझुनूं सीमा पर अष्ट दुर्गाओं में सातवीं दुर्गा मां शाकंभरी देवी का मंदिर प्रमुख शक्ति पीठों में एक है। जहां प्राप्त हुए 8वीं व 9वीं शताब्दी के शिलालेख मंदिर की प्राचीनता का परिचय देते हैं। शाकंभरी मंदिर में दो मूर्तियां एक शाकम्भरी व दूसरी काली मैया की है। मान्यता के अनुसार यहां पहले शाकम्भरी माता की मूर्ति ही थी। काली माता की मूर्ति नजदीक किसी गांव से लाई गई थी। जिसके रोद्र प्रभाव को काशी के पंडितों ने शांत करवाया था। नवरात्रि में श्रद्धालुओं के हुजूम से अटने वाला यह धार्मिक स्थल लोहागर्ल की 24 कोसीय परिक्रमा का हिस्सा है।
3. जीणमाता:
9वीं शताब्दी का मां जीणमाता का मंदिर अंचल का प्रमुख शक्ति पीठ है। यहांं अष्ट भुजाधारी व शेर पर सवार मां जयंति देवी की मूर्ति दैत्य मर्दन मुद्रा में है। कथा के अनुसार चूरू के घांघू गांव की चौहान परिवार की जीण नामक कन्या भाई से नाराज होकर काजल शिखर पर तपस्यालीन हो गई थी। जो नहीं लौटने पर भाई हर्ष भी नजदीक पहाड़ी (हर्ष ) पर तपस्या में बैठ गए। बाद में इन्हीं जीण ने जयंति व हर्ष ने भैरव का स्वरूप प्राप्त किया। औरंगजेब के आक्रमण के दौरान भंवरा देवी के भंवरों के आक्रमण से सेना के भाग छूटने की कथा भी इस मंदिर से जुड़ी है। चैत्र व शारदीय नवरात्रा में यहां 9 दिवसीय मेले का आयोजन होता है।
4. ओवल दे सोवल दे मंदिर:
खंडेला के सलेदीपुरा गांव के पास 800 साल पुराना ओवल दे सोवल दे सती मन्दिर धर्म के साथ पुरातत्व महत्व का भी है। अरावली पहाडियों की तलहटी में अपनी कलाकृतिक विरासत को संजोये यह मंदिर आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। यहां मिले प्राचीन अवेशषों के चलते पुरातत्व विभाग ने इसे संरक्षित स्थल घोषित किया है। बावजूद इसके ये स्थल संरक्षण के अभाव में जर्जर होता जा रहा है।
5. गणेश्वर:
नीमकाथाना की अरावली की पहाडिय़ों में में स्थित गणेश्वर धाम आस्था के साथ ताम्रयुगीन सभ्यता से भी संबंध रखता है। इसे ऋषि गालव की तपोस्थली कहा जाता है। 17 मंदिरों वाले गणेश्वर धाम में चमत्कारिक कहे जाने वाले ठंडे व गर्म कुंड में स्नान का विशेष धार्मिक महत्व है। यही वजह है कि अमावस्या व सूर्य- चंद्र ग्रहण सहित अन्य अवसरों पर स्नान के लिए यहां श्रद्धालुओं की खूब भीड़ जुटती है।
6. बालेश्वर:
बालेश्वर धाम भी सीकर के नीमकाथाना में अरावली की वादियों में स्थापित मंदिर है। यहां विश्व के सबसे बड़े ज्योतिर्लिंग होने का दावा किया जाता है। एक पानी के कुंड में चमत्कारिक ढंग से पानी का आना भी यहां श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है।
7. टपेकश्वर:
महाभारत काल से संबंधित माना जाने वाला टपकेश्वर महादेव मंदिर भी नीमकाथाना की अरावली पहाडिय़ों को आस्था का केंद्र बनाता है। इस मंदिर मेंं बरसात की बूंदों से भगवान शिव का जलाभिषेक आस्था के साथ अचरज का बड़ा विषय बना हुआ है। शिवरात्रि व सावन के महीने में इस धाम में काफी श्रद्धालु भगवान शिव को शीश नवाने पहुंचते हैं।
8. गोपीनाथ मंदिर
सीकर शहर के सुभाष चौक में नगर सेठ के रूप में विराजे राजा गोपीनाथजी का मंदिर अपने सौंदर्य व चमत्कारों के लिए प्रसिद्ध है। मंदिर की मूर्ति सीकर के प्रथम शासक राव दौलत सिंह के समय बंगाल से मुगल आक्रमण से बचाकर लाई गई थी। जिसे राव शिवसिंह ने मंदिर बनवाकर नगर के राजा के रूप में प्राण प्रतिष्ठित किया। तब से गोपीनाथजी ही सीकर के राजा कहलाते हैं। मंदिर में घोषित तिथियां व त्योहार ही पूरे शहर में मान्य होते हैं। देवउठनी एकादशी पर तुलसी के साथ विवाह का मंदिर में बड़ा उत्सव होता है। जन्माष्टमी सहित अन्य पर्वों पर मंदिर में श्रद्धालुओं का हुजूम उमड़ता है।
9. मनोकामनापूर्ण महालक्ष्मी मंदिर
खाटूश्यामजी के नजदीकी गांव डूकिया में महालक्ष्मी मनोकामनापूर्ण मंदिर बढ़ती आस्था का केंद्र बन गया है। यहां जमीन की खुदाई में निकली मां लक्ष्मी की एक मूर्ति व मां लक्ष्मी के पैरों के निशान प्रकट होने के चमत्कार की मान्यता ने मंदिर को प्रमुख आस्था का केंद्र बना दिया है। लंबे चौड़े क्षेत्र में फैले इस मंदिर में वृंदावन के प्रेम मंदिर की तर्ज पर विशाल मंदिर का निर्माण किए जाने के साथ रिसोर्ट व वाटर पार्क की सुविधा विकसित किया जा रहा है।
10. रींगस के भैरुंजी
सीकर के रींगस के भैरुंजी की मान्यता व इतिहास दोनों अनूठा है। मान्यता के अनुसार मार्गशीर्ष की कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन भैरुंजी भगवान शिव के पांचवे रूद्र अवतार के रूप में प्रकट हुए। जिन्हें रींगस में श्मशान भूमि के चबूतरे पर प्रतिष्ठित किया गया। बाद में हवा से उठती शमशान की भस्म से भैरुजी की मूर्ति विशाल होती गई। जिसके बाद चबूतरे को मंदिर का रूप दिया गया। भैंरू अष्टमी के मेले सहित अन्य आयोजनों पर यहां लाखो लोग हर साल पहुंचते हैं। मान्यता है कि ब्रम्हाजी के पांचवे मुख को धड़ से अलग करने पर ब्रम्हा हत्या के पाप से बचने के लिए रुद्रांश भैरूंजी ने त्रिलोकी की यात्रा भी रींगस से ही शुरु की थी।
11. हर्ष का शिव मंदिर
हर्ष पर्वत पर संवत 1018 में निर्मित हर्षनाथ का मंदिर तथा काला व गौरा भैरव मंदिर भी अंचल के प्राचीन धार्मिक केन्द्र हंै। जहां शिवरात्रि से लेकर नवरात्रि तक में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। भैरव मंदिर में शुक्ल पक्ष में गौरे व कृष्ण पक्ष में काले भैरव की उपासना की परंपरा रही है। महिसासुर मर्दन की खंडित मूर्ति के अलावा यहां साधु- संतों, ऋषि मुनियों, गंधर्वों, अप्सराओं, दिग्पालों, इंद्र व भगवान विष्णु के अलावा भगवान गणेश की अद्र्धनारीश्वर रूप की मूर्ति भी है। जो दुर्लभतम मुर्तियों में मानी जाती है। औरंगजेब के आक्रमण क शिकार हुए हर्ष पर शिवालय का निर्माण सीकर रियासत के दूसरे शासक राव शिव सिंह ने संवत 1781 में किया था।
12. सालासर बालाजी
चूरू में सालासर बालाजी का सिद्ध धाम जगतख्यात है। खेत में जमीन से निकली मूर्ति के बाद संत मोहनदास की इ'छा पर मंदिर की स्थापना 266 साल पहले हुई थी। जहां के प्रति लोगों की आस्था लगातार अगाध होती जा रही है। लाखों भक्तों की आस्था के केंद्र इस मंदिर की खास बात यहां हनुमानजी की प्रतिमा दाढ़ी मूंछ में होना भी है। मान्यता है कि मोहनदास बाबाजी की इ'छा पर हनुमानजी ने उन्हें दाढ़ी- मूंछ में ही दर्शन दिए थे। सालासर बालाजी धाम में मोहनदास बाबाजी की करीब 300 साल पुरानी धूणी भी है। जो काफी बालाजी की मूर्ति की तरह ही काफी चमत्कारी मानी जाती है।
13. मालासी के भैरूंजी
चूरू की सुजानगढ़ तहसील में सालासर से 15 किमी दूर स्थित मालासी गांव में मालासी अथवा रिक्तया भैरुजी कुएं में पूजे जाते हैं। जहां प्रदेशभर से लाखों श्रद्धालु हर साल बाबा भैरव के दर्शनों के लिए पहुंचते हैं। कहा जाता है कि मालासी गांव में रिक्त्या जी का ससुराल है। जहां कुएं में गिरने पर ग्रामीणों ने उनका मंदिर बनवा दिया। तब से उन्हें धोक लगाने काफी श्रद्धालु देशभर से पहुंचते हैं। उनके जन्मस्थान झुंझुनू जिले के नवलगढ़ तहसील स्थित खिरोड़ में भी उनका प्रसिद्ध मंदिर है।
14. इच्छापूर्ण बालाजी:
चूरू के सरदारशहर में द्रविड़ शैली के इच्छापूर्ण बालाजी मंदिर की स्थापना 13 फरवरी 2005 में हुई। रतनगढ़-गंगानगर हाईवे पर सरदारशहर से आठ किमी पहले स्थित मंदिर की खासियत इसका राजशाही दरबार के रूप में निर्माण होना है। जहंा हनुमानजी राजा की तरह आशीर्वाद की मुद्रा में विराजित है। मूलचन्द विकास कुमार मालू की ओर से बनाए गए इस मंदिर को दक्षिण भारत व पश्चिमी बंगाल के कारीगरों ने बनाया था।
15. ददेरवा धाम
चूरू का ददेरवा धाम लोक देवता जाहरवीर गोगाजी की जन्म स्थली के रूप में 11वीं सदी से आस्था का बड़ा केंद्र है। जहां वीरों भोमिया एवं सतियों के देवालय स्मारक बहुतायत मेें हैं। गुरु गोरखनाथ के आशीर्वाद से जन्मे गोगाजी को शीश नवाने देश- विदेश से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। एक महीने के लक्खी मेले में यह धाम पूरी तरह श्रद्धालुओं से अट जाता है। यूपी के लाखों श्रद्धालु गोगाजी को बागड़ पीर के रूप में पूजते हैं औैर खुद को उनके ससुराल पक्ष का मानकर शोक स्वरूप पीले वस्त्र धारण कर भाद्रपद माह में नंगे पांव ददेरवा आकर पूजा-अर्चना करते हैं।
16. वेंकटेश्वर मंदिर:
चूरू के सुजानगढ़ में दक्षिण भारत शैली में निर्मित वेंकटेश्वर मंदिर आस्था के साथ अद्भुत कलाकृति का संगम है। जिसका निर्माण सुजानगढ़ निवासी सोहनलाल जाजोदिया ने भगवान वेंकटेश्वर में गहरी आस्था के कारण 1994 में करवाया। मंदिर में भगवान विष्णु के दशावतार व रामायण के प्रंसगों का सचित्र वर्णन है। वेंकटेश्वर भगवान के अगल-बगल में गोदाम्बा (अडांमादेवी) व पद्मावती (पत्नी) अर्थात लक्ष्मी जी की प्रतिमा है।
17. बांयाजी मंदिर
चूरू के सरदारशहर के बायला गांव में करीब 650 साल पुराने बांयाजी के मंदिर में देश भर से श्रद्धालु जात- जड़ूला देने आते है। नवरात्रा में यहां 9 दिवसीय विशाल मेला भरता है। जहां देशभर से कालबेलिया समाज के लोग खासतौर पर माथा टेकने आते हैं। सैंकड़ों बीघा जमीन के मालिकाना हक वाले इस मंदिर की खासियत यहां आक का पौधा नहीं लगना है। बायांजी महाराज के कारण इस गांव की महिलाएं घूंघरू की पायल नहीं पहनती।
18. साहवा का गुरुद्वारा
चूरू जिले का साहवा गांव सांप्रदायिक सौहार्द व धर्म के एक बड़े धाम के रूप में विख्यात है। अपनी दक्षिण यात्रा के दौरान सिख गुरु गोविंद सिंह चूरू के साहवा में जिस तालाब किनारे रुके वहां बने गुरूद्वारा गुरू गोविन्दसिंह के अलावा रोही में गांव से 5 किमी दूर गुरूद्वारा नानक टीला स्थित गुरूद्वारे में माथा टेकने देश विदेश से श्रद्धालु आतेे हैं। इसी तरह वीर कांधल देव का मन्दिर व स्मारक, नाथ संप्रदाय का मठ, हनुमान मन्दिर, विश्वकर्मा मन्दिर, केशरो जी महाराज मन्दिर, गायत्री पीठ के अलावा कई समाज के पितरों के थान तथा कई कुए व बावड़ी भी यहां ऐतिहासिक व धार्मिक महत्व रखती है।
19. राणी सती मंदिर: झुंझुनूं का राणी सती मंदिर 400 साल से भी ज्यादा पुराना धार्मिक स्थल है। कहा जाता है कि राणी सती स्त्री शक्ति की प्रतीक और मां दुर्गा का अवतार थीं। उन्होंने अपने पति के हत्यारे को मार कर बदला लिया और फिर अपनी सती होने की इच्छा पूरी की। संगमरमर से बना ये मंदिर देश के अमीर मंदिरों में शुमार है। मंदिर परिसर में शिवजी, गणेशजी, माता सीता और रामजी के परम भक्त हनुमान को समर्पित मूर्तियों के अलावा षोडश माता का सुंदर मंदिर है। जिसमें 16 देवियों की मूर्तियां लगी हैं। परिसर में सुंदर लक्ष्मीनारायण मंदिर भी बना है।
20. लोहागर्ल पीठ: झुंझुनूं का लोहागर्ल क्षेत्र महाभारतकाल से भी पुराना माना जाता है। मान्यता है कि भगवान परशुराम ने यहां पश्चाताप यज्ञ किया था। वहीं, पांडवों की लोहे की बेडिय़ां भी यहीं कुंड में गली थी। जिसकी वजह से ये क्षेत्र लोहागर्ल कहलाया। यहां का सूर्य मंदिर व कुंड आस्था के प्रमुख केंद्र है। जहां हर साल लाखों लोग पहुंचते हैं।
21. कदमा का बास: सीकर से करीब 13 किमी दूर स्थित कदमा का बास भगवान श्रीकृष्ण के प्रकट होने की मान्यता के कारण प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है। मान्यता है कि कर्दम ऋषि की तपस्या से प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण ने उन्हें यहीं दर्शन दिए थे। जहां उनके सात कदम रखने पर कदम्ब के सात पेड़ उग गए। इसी वजह से ये क्षेत्र भी कदम्ब का बास कहलाया। जो बाद में कदम का बास कहलाने लगा।
22. दिगंबर जैन भव्योदव अतिशय क्षेत्र: सीकर के रैवासा गांव का श्री दिगंबर जैन भव्योदय अतिशय क्षेत्र आस्था व अचरज का बड़ा केंद्र है। विक्रम संवत 1205 में बने इस मंदिर में जहां भगवान सुमतिनाथ की मूर्ति भूगर्भ से निकलने व भगवान शांतिनाथ की मूर्तियां चोरी होने पर भी वापस मिलने की वजह से चमत्कारिक मानी जाती है, वहीं 108 खंभों पर खड़ा मंदिर बनावट के लिहाज से भी अनूठा है। जिसके खंभों की वास्तविक संख्या नहीं गिना जाना अचंभे का विषय है।
23. नरहड़ की दरगाह: झुंझुनूं के चिड़ावा में नरहड़ गांव स्थित हाजिब हजरत शक्करबार शाह दरगाह सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल है। यहां जन्माष्टमी पर मेला लगता है तो सालाना उर्स भी आता है। इतिहासकारों के अनुसार सूफी संत शक्करबार पीर बाबा ईरान की तरफ से भारत आए थे। उन्होंने नरहड़ गांव में दीन दुखियों की मदद कर करीब 750 वर्ष पहले समाधी ली थी। तभी से ये आस्था का केंद्र है।
24..रामदेवजी का मंदिर: झुंझुनूं के नवलगढ़ कस्बे में लोकदेवता बाबा रामदेव के मंदिर भी श्रद्धा का बड़ा स्थल है। भाद्रपर शुक्ल नवमी पर बड़े मेले सहित यहां दो वार्षिक मेले भरते हैं। मान्यता है कि नवलगढ़ के राजा नवल सिंह द्वारा कर की राशि से अज्ञात महिला का भात भरने से नाराज दिल्ली बादशाह ने उन्हें दिल्ली ले जाकर कैद में डाल दिया था। जिन्हें रामदेवजी के घोड़े ने कारावास से छुड़वाकर नवलगढ़ पहुंचाया था। जहां उनका घोड़ा आकर रुका वहीं बाबा रामदेव का मंदिर बनाया गया।
Published on:
01 Jan 2023 12:42 pm
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