
सीकर. मां की इकलौती संतान और वह भी मानसिक विमंदित। लेकिन, इस लाडो ने ऐसा करिश्मा कर दिखाया है, जिसका कोई सानी नहीं है। मानसिक विमंदित की टी-20 केटेगरी में शामिल इस बिटियां का दिमाग सामान्य बच्चों के बजाय न के बराबर है। परंतु पहली बार पैराओलंपिक खेल प्रतियोगिता में मैदान पर उतरने वाली 13 साल की यह सनेत्रा दौड़ की तीन अलग-अलग मुकाबलों में प्रथम आकर तीनों जगह गोल्ड मेडल हासिल किए हैं।
जिसके बदले सरकार की ओर से इस होनहार और उम्दा प्रदर्शन करने वाली खिलाड़ी को हर एक गोल्ड मेडल पर एक-एक लाख रुपए का नकद पुरस्कार दिया जाएगा। जी हां, उदयपुर में हाल ही में आयोजित राज्य स्तरीय पैराओलंपिक में नानी गांव की मानसिक विमंदित बालिका सनेत्रा ने दौड़ में हिस्सा लिया था।
हालांकि दिमाग कम होने के कारण इस बालिका को हार-जीत तक का फर्क मालूम नहीं था। लेकिन, दौड़ों-दौड़ों की बार-बार हूटिंग पर यह अंत तक सीधी दौड़ती रही। जिसका नतीजा यह निकला कि वह बार्डर लाइन के आगे निकल गई और दौड़ की 100, 200 व 400 मीटर की प्रतियोगिता में प्रथम स्थान पर रही। अर्जुन अवार्डी कोच महेश नेहरा का कहना है कि सनेत्रा प्रदेश की पहली मानसिक विमंदित खिलाड़ी है। जिसने विजेता का यह मुकाम हासिल किया है।
हालांकि इसको जीत का एहसास नहीं था। लेकिन, इसकी इस उपलब्धि पर मैदान पर मौजूद सभी खेल प्रेमी तालियां बजाकर इसका हौसला बढ़ा रहे थे। सनेत्रा की इस उपलब्धि पर हर गोल्ड मेडल पर उसे एक-एक लाख रुपए देकर पुरस्कृत किया जाएगा। पुरस्कार वितरण समारोह इसी साल जयपुर में होगा।
रंग लाया मां का भरोसा
सनेत्रा की मां संतोष कुमारी खुद सरकारी शिक्षक है और उसी ने इसको इस लायक बनाया है कि कोई यदि उसको कुछ कह रहा है तो उसे समझने व मानने का प्रयास करे। हालांकि सनेत्रा की मां का कहना है कि ऐसे बच्चे पढ़ाई में तो कमजोर होते हैं। लेकिन, खेल-कूदने में इनकी थोड़ी रूचि रहती है। इशारा करने या बार-बार कहने पर ये इस बात को समझ लेते हैं कि इन्हें दौडऩे के लिए कहा जा रहा है या फिर बैठने या चलने-फिरने के लिए। थोड़ी बात समझने व मानने पर भरोसा कर मैने इसे दौड़ की प्रतियोगिता में भिजवाया और जो काम ? सामान्य बच्चे नहीं कर पाते हैं वह इसने कर दिखाया। मुझे मेरी नटखट बिटियां पर गर्व है।
Updated on:
03 Jan 2018 11:54 am
Published on:
03 Jan 2018 11:53 am
बड़ी खबरें
View Allसीकर
राजस्थान न्यूज़
ट्रेंडिंग
