
सीकर. शारदीय नवरात्र में देशभर में रामलीलाओं का मंचन हो रहा है। लोग न केवल रामलीला देखने बल्कि रामलीला के पात्रों के संवाद भी सुनने जाते हैं, मगर राजस्थान के बिसाऊ में ऐसा नहीं होता। बिसाऊ में लोग रामलीला सिर्फ देख ही सकते हैं, क्योंकि यहां के पात्र बोलते नहीं हैं। राम-रावण के साथ-साथ अन्य सभी मूक रहते हुए ही अपना अभिनय करते हैं। फिर भी बिन बोले ही सब कुछ जाते हैं। जानिए इस मूक रामलीला की कुछ खास बातें व आगे की स्लाइड् में देखे अधिक तस्वीरें।
-बिसाऊ की मूक रामलीला में पात्रों के पहचान संवाद से नहीं बल्कि मुखोटों से होती है।
-मूक रामलीला को देखने के लिए स्थानीय लोगों के साथ-साथ विदेशी सैलानी भी आते हैं।
-साम्प्रदायक सौहार्द की मिसाल बिसाऊ की रामलीला में मुस्लिम समुदाय के लोग ढोल नगाड़े बजाते हैं।
-बिसाऊ रामलीला की शुरुआत रामाणा जोहड़ से हुई थी
-जोहड़ के बाद इसका मंचन गुगोजी के टीले पर होने लगा।
-काफी समय तक मूक रामलीला बिसाऊ रेलवे स्टेशन पर भी हुई।
-वर्ष १९४९ से गढ़ के पास बाजार में मुख्य सडक़ पर लीला का मंचन होता है।
-बिसाऊ झुंझुनूं जिले में चूरू सीमा पर स्थित है। यहां की रामलीला पूरे शेखावाटी में अनूठी है।
-मूक रामलीला से लम्बे समय से जुड़े रहे ‘ताऊ’ किशोरी लाल पुजारी का हाल ही निधन हो गया।
बिसाऊ में मूक क्यों होती हैं रामलीला
बिसाऊ में होने वाली रामलीला मूक क्यों होती है?। इसके कई कारण हैं। इस बारे में इतिहासकार डा. उदयवीर शर्मा के अनुसार 17६ वर्ष पूर्व जमना नाम की एक साध्वी ने बच्चों को एकत्र कर के रामाणा जोहड़ पर लीला प्रारंभ की थी। उस समय शायद पात्रों को संवाद बोलने में परेशानी आने के चलते और लीला में रावण के वंश सहित हनुमान , बाली-सुग्रीव, जामवंत, नल-नील, दधिमुख आदि पात्रों के चेहरे पर मुखौटे लगा कर लीला का मंचन किया। तब बिसाऊ में मूक रामलीला हो रही है।
Updated on:
28 Sept 2017 04:38 pm
Published on:
28 Sept 2017 04:35 pm
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