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मदर्स डे स्पेशल: मां ने बेटे को शैतानी की छूट दी तो आया सबको चौेंका देने वाला यह परिणाम

सीकर.पूरे सालभर बच्चे ने जमकर शैतानी की लेकिन मैंने कभी बच्चे को टोका नहीं।

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मदर्स डे स्पेशल: मां ने बेटे को शैतानी की छूट दी तो आया सबको चौेंका देने वाला यह परिणाम


सीकर.पूरे सालभर बच्चे ने जमकर शैतानी की लेकिन मैंने कभी बच्चे को टोका नहीं। जब लगा कि अब तो सीबीएसई दसवीं की एग्जाम में दस दिन का समय बचा है तो सोचा अब तो बोलना चाहिए। तब एक दिन कहा कि बेटा एग्जाम आ गए। बेटे ने भी उन दिनों में 10 से 12 घंटे तक लगातार पढ़ाई की। परिणाम से पहले लगा कि बेटा पास हो जाए तो भी बहुत है। लेकिन जब सीबीएसई कक्षा दसवीं का परिणाम आया तो अपने बेटे पर गर्व महसूस हुआ। बेटे ने मेरे सपनों से भी ज्यादा 73. 03 फीसदी अंक हासिल कि है। यह कहानी है पालवास रोड पर किराए का मकान लेकर रहने वाले मोहम्मद अमान की। बकौल अमान, मुझे अपने आप पर भरोसा था कि मैं दस दिन में भी कवर कर सकता हूं। इसलिए अपने खेल और शैतानी के शौकों को जिन्दा रखा। इसी तरह अमान के सगे भाई मोहम्मद शाहिल के भी सीबीएसई दसवीं के परिणाम में 58 फीसदी अंक आए है। मां जरीना बेहद खुश है। पिता असगर बताते है कि पूरे साल भर बेटे ने खेलकूद, शैतानी और जमकर मोबाइल देखा। लेकिन बेटे ने मेहनत से पूरे परिवार का मान बढ़ा दिया।

बच्चों पर बोझ थोपने के बजाय खुशियां बांटे
मां जरीना का कहना है कि आजकल लोग अपने बच्चों पर क्षमता से ज्यादा एज्युकेशन का बोझ थोप देते है। हर घर में पड़ौसी के बच्चों से तुलना होती है कि पड़ौसा का बच्चा तो 97 फीसदी अंक लेकर आया है। इस तरह का बच्चों को माहौल देने से तनाव बढ़ता है, इसका खामियाजा बच्चों को ताउम्र भुगतना पड़ता है। खास बात यह है कि इस तरह की स्थिति में बच्चा जो करना चाहता है वह भी नहीं कर पाता है।

शिक्षकों पर भरोसा करें, कमी नहीं निकाले
वर्तमान दौर में हम बच्चों को अपनी मर्जी से स्कूल में प्रवेश दिलाते है। कुछ दिन बाद हम शिक्षकों में कमी तलाशने लग जाते है। जबकि 15 वर्ष पहले बच्चों को प्रवेश दिलाने के बाद अभिभावक कम ही ध्यान देते थे। ऐसे में बच्चा के घर से लेकर स्कूल तक शिक्षक पूरी निगरानी भी रखता है। लेकिन कुछ अभिभावकों की वजह से स्थिति थोड़ी बदली है। जरीना का कहना है कि बच्चों की सफलता में बड़ा रोल शिक्षकों का भी रहा है।

हर मां चाहती है उसका बेटा उससे भी बड़ा बने
हर मां-बाप चाहते है कि उसका बेटा उनसे बड़ा होकर समाज में एक मुकाम बनाए। लेकिन परिणाम के आधार पर भविष्य को तोलना भी गलत है। सैकण्ड डिविजन पास होने वाले कई बच्चे आईएएस, डॉक्टर और अच्छे शिक्षक भी बनते है। इसलिए आधे रास्ते में ही बच्चों के सपनों को नहीं तोडऩा चाहिए और उनकी इच्छाओं के हिसाब से खुली छूट दें।