
कंटीले खेतों व तपते पहाड़ों पर नंगे पैर दौडने वाली घुमंतु मंदबुद्धि ने नेशनल चैंपियनशिप में जीते तीन पदक
सचिन माथुर
सीकर. मेहनत के साथ मंसूबे मजबूत हो तो मानसिक मंदता भी मुकाम तक पहुंचने से नहीं रोक सकती। फिर चाहे परिवेश व परिस्थति भी कैसी हो। ये साबित कर दिखाया है बावरिया समाज के घुमंतु परिवार की 14 वर्षीय रजनी बावरिया ने। जो मंद बुद्धि होने के साथ झोपड़े में रहकर परिवार के साथ मजदूरी करते हुए अभाव में जीवन जी रही है। लेकिन, खेल में उसकी लगन ऐसी है कि कंटीले खेतों व तपते पहाड़ों पर नंगे पैर दौड़कर अभ्यास करते हुए भी वह राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में तीन गोल्ड मेडल व राष्ट्र स्तरीय प्रतियोगिता में दो रजत सहित तीन पदकों तक पहुंच गई। इसी साल उड़ीसा में हुए नेशनल पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप की 1500 मीटर दौड़ व लम्बी कूद में दो रजत व 400 मीटर दौड़ में एक कांस्य पदक हासिल करने वाली रजनी की उपलब्धि में पैरा ओलंपिक अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी महेश नेहरा की नसीहत व बहन सरिता की मेहनत भी अहम रही।
नंगे पैर दौड़ व पेड़ पर चढऩे की कला में दिखी प्रतिभा
सीकर के चंदपुरा गांव में रहने वाली रजनी के पिता टीकूराम व मां नान्ति देवी खेत मजदूर हैं। छह भाई बहनों में एक रजनी जन्म के समय बिल्कुल सामान्य थी। पर उम्र बढऩे के साथ उसका मानसिक विकास नहीं हुआ। सरकारी स्कूल में प्रवेश कराया तो खेल कूद में उसकी दिलचस्पी ज्यादा दिखी। नंगे पैर ही वह तेज दौड़ लगाती थी। पेड़ पर चढ़कर फल तोडऩे में भी उसे चंद सैकंड ही लगते। उसकी ये प्रतिभा देखकर पैरा ओलपिंक खिलाड़ी महेश नेहरा से प्रशिक्षण हासिल कर रही उसकी बहन सरिता ने रजनी को भी अपने कोच की मदद से प्रशिक्षण देना शुरू किया। जिसका ही परिणाम उड़ीसा में हुई 20वीं नेशनल पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप में तीन मेडल के रूप में सामने आया।
कंटीले खेतों व पहाड़ों पर लगाई दौड़, चंद सैकंड दूर रहा स्वर्ण पदक
खराब माली हालत के चलते रजनी के पास शुरू में जूते व चप्पल तक नहीं थे। ऐसे में कंटीले खेतों, तपती सड़क व पहाड़ों पर भी वह नंगे पैर ही दौड़ लगाती थी। बकौल नेहरा उसकी इसी लगन को देख उन्होंने सीकर के एक खेल मैदान में उसे अभ्यास करवाया। बाद में चैंपियनशिप से पहले उसे जयपुर ले जाकर अपने खर्च पर विशेष प्रशिक्षण दिया। जिसके चलते उसने पहले राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में 1500 मीटर व 400 मीटर दौड़ व लंबी कूद में तीन स्वर्ण पदक हासिल किए। वहीं, राष्ट्रीय प्रतियोगिता में भी महज चंद सैकंड के फासले से स्वर्ण पदक से चूक गई। नेहरा ने बताया कि रजनी का ज्यादातर प्रशिक्षण सरिता के निर्देशन में ही हुआ।
पूरा परिवार करता है मजदूरी, खुद भी करती है सहयोग
रजनी का पूरा परिवार मजदूरी करता है। वह दूसरों के खेतों में काम करता है। जिसमें रजनी भी उनका सहयोग करती है। इसी बीच वह पढ़ाई के साथ खेल के लिए भी समय निकालती है।
Published on:
23 May 2022 02:28 pm
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