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पत्रिका से बातचीत में बोले झाझडिय़ा, कहा-खेल नीति तोड़ रही युवाओं के अरमान

पिछले दस वर्ष से खेल नीति को लेकर सिर्फ कागजी घोड़े दौड़ाए जा रहे हैं। आज भी गांव-ढाणियों के खिलाड़ी कंटीले मैदानों पर खेलने को मजबूर हैं। यदि अच्छे कोच और मैदान मिले तो स्थिति बदल सकती है। यह बात उन्होंने गुरुवार को राजस्थान पत्रिका कार्यालय में बातचीत के दौरान कही।

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dinesh rathore

Feb 17, 2017

पैराओलम्पिक में स्वर्ण पदक विजेता देवेन्द्र झाझडि़या ने कहा कि राजस्थान के युवाओं से पदक जीतने की उम्मीद तो पूरी दुनिया करती है, लेकिन खेलनीति की किसी को फ्रिक नहीं। पिछले दस वर्ष से खेल नीति को लेकर सिर्फ कागजी घोड़े दौड़ाए जा रहे हैं। आज भी गांव-ढाणियों के खिलाड़ी कंटीले मैदानों पर खेलने को मजबूर हैं। यदि अच्छे कोच और मैदान मिले तो स्थिति बदल सकती है। यह बात उन्होंने गुरुवार को राजस्थान पत्रिका कार्यालय में बातचीत के दौरान कही। झाझडि़या ने कहा कि यदि युवाओं को हरियाणा, पंजाब व केरल सहित अन्य राज्यों के मुकाबले में सुविधा मिले तो यहां के युवा भी पदकों से झोली भर सकते हैं। उन्होंने कहा कि इस बार सोना जीतने के बाद देशभर में जो प्यार मिला वह अभूतपूर्व था।

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हार नहीं माने, जुनून से जुटे रहे

कॅरियर की हार-जीत के अनुभव साझा करते हुए झाझडि़या ने बताया कि खेल जिदंगी के सफर की तरह है। कई बार जिदंगी में जिस तरह अपने हरा देते हैं, लेकिन हार नहीं मानता और फिर जिदंगी की पटरी दौडऩे लग जाता है। ठीक इसी तरह खेल है।

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राजनीति में जाने का अभी कोई मन नहीं

झाझडि़या ने कहा कि अभी भी उनका पूरा ध्यान खेलों पर है। इसके लिए लगातार नियमित अभ्यास भी करते हैं। राजनीति में जाने के सवाल पर झाझडि़या ने कहा कि अभी तक कोई मन नहीं बनाया है। मुझे खेल के जरिए दुनिया में पहचान मिली है। इसलिए पहली प्राथमिकता खेल है। उन्होंने बताया कि राजनीति से काफी अच्छा खेल जीवन है।

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