
कविता: खाली कंधों पर थोड़ा सा भार चाहिए
खाली कंधों पर थोड़ा सा भार चाहिए
खाली कंधों पर थोड़ा सा भार चाहिए
बेरोजगार हूं साहब बस रोजगार चाहिए।
जेब में पैसे नहीं है, डिग्री अनेक लिए फिरता हूं
दिनों दिन अपनी ही नजरों से गिरता हूं
लेकिन क्या करूं साहब बेरोजगार हूं।
काबयाबी को घर में खुले दरवाजे चाहिए
पर उस घर को कैसे सजाऊं, जेब में रुपये चाहिए
क्योंकि बेरोजगार हूं साहब, रोजगार चाहिए।
टैलेंट की कमी नहीं है भारत की सड़कों पर
दुनिया बदल सकते हैं, बस भरोसा चाहिए
लिखते लिखते लगतार अंगुलियां घिस गई
पर नौकरी कैसे मिले, वो तो पहले ही बिक गई
नौकरी की प्रक्रिया में अब तो सुधार चाहिए
क्योंकि बेरोजगार हूं साहब, रोजगार चाहिए।
दिन रात एक करके मेहनत बहुत करता हूं
सूखी रोटी खाकर ही पेट भर लेता हूं
भष्टाचार से लोग अच्छी अच्छी नौकरी पा लेते हैं
रिश्वत की कमाई से खूब मजे मार लेते हैं
नौकरी पाने के लिए कर चुका हूं सब जुगाड़
क्योंकि बेरोजगार हूं साहब, रोजगार चाहिए।
बस रोजगार चाहिए साहब रोजगार
मनीष कुमार गढ़वाल, बीए, एमएड, लक्ष्मण का बास
Published on:
06 Sept 2020 04:45 pm
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