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सतरंगी है शेखावाटी की संस्कृति, अलग है भाषा, भूषा, भेष और भाव

सचिन माथुर शेखावाटी की संस्कृति विचित्रता व विविधता से भरी है। जिसमें विशिष्टता भी भरपूर है। पहनावे से लेकर खान-पान व त्योहारों से लेकर मकान तक में यहां कई रंग देखने को मिलते हैं।

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सीकर

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Sachin Mathur

Jan 04, 2022

सतरंगी है शेखावाटी की संस्कृति, अलग है भाषा, भूषा, भेष और भाव

सतरंगी है शेखावाटी की संस्कृति, अलग है भाषा, भूषा, भेष और भाव

सीकर. शेखावाटी की संस्कृति विचित्रता व विविधता से भरी है। जिसमें विशिष्टता भी भरपूर है। पहनावे से लेकर खान-पान व त्योहारों से लेकर मकान तक में यहां कई रंग देखने को मिलते हैं। जो अतीत के सैंकड़ों सालों में भी अपनी चमक बरकरार रखे हुए हैं। यहां की संस्कृति में सरलता, समरसता व शौर्य है तो आस्था, उल्लास व आनंद भी अनंत है। पेश है शेखावाटी की अतरंगी संस्कृति का परिचय करवाती विशेष रिपोर्ट


पगड़ी- लूगड़ी का पहनावा:

अंचल का पहनावा भी अनूठा है। यहां की महिलाएं लहंगा, लुगड़ी और कांचली- कुर्ती पहनती है। जिनका कपड़ा औरों के मोटे कपड़े के मुकाबले पतले पोत का होता है। जबकि धोती- कुर्ता तथा साफा या पगड़ी यहां के पुरुषों का प्रमुख पहनावा रहा है। स्वामी विवेकानंद द्वारा पहना जाने वाला साफा शेखावाटी की पहचान रही है। हालांकि बढ़ते शहरीकरण के कारण पहनावे पर पश्चिमीकरण हावी हो रहा है।

भांत- भांत की भाषा
शेखावाटी की बोली भी प्रदेश के अन्य इलाकों से इतर है। जयपुर की ढूंढाड़ी भाषा में जहां सहायक क्रिया के रूप में छ: का उपयोग होता है, वहीं शेखावाटी में हिंदी की तरह है ही का उपयोग होता है। हालांकि यहां भी स्थान बदलने के साथ बोली में कुछ बदलाव हो जाता है। जैसे खेतड़ी, पाटन सहित कई इलाकों में सहायक शब्द के रूप में था, थो का प्रयोग होता है।


मेलों व गीतों की संस्कृति:

शेखावाटी के मेले भी अंचल की सभ्यता, संस्कृति व आस्था के परिचायक हैं। खाटूश्यामजी, सालासर, जीणमाता व शाकंभरी मेले के अलावा ददेरवा का गोगाजी मेला, नवलगढ़ का रामदेवजी का मेला, झुंझुनूं व सीकर के राणी सती मेले, तीज- गणगौर के मेले, लाखनी का माणा बाबा मेला, गणेश्वर का बाबा रायसल महाराज का मेला, थोरासी का पीर बाबा मेला सहित गांवों के स्थानीय मेले मनोरंजन, आस्था व आकर्षण केंद्र रहे हैं। हर त्योहर व मेलों के अलग अलग गीत व रातीजगा में रातभर इनका गायन आज भी परंपरा का अहम हिस्सा हैं।

शेखावाटी के प्रतीक:

यहां के जलकूप व कुएं अलग पहचान रखते हैं। ऊंचे चबूतरे के चारों पाŸवो में मरवे और एक कोने में बजरंग बली का स्थान रहता था। कुएं के चारों तरफ चार ढाणे, चबूतरे व घड़ोलये व नीचे दीवार से सटकर खेलियां बनाई जाती रही है। इसके अलावा जल भंडारन के लिए एक बड़ी टंकी कोठा होती थी। बाद में प्रदेश सहित देश के कई भागों तक ये व्यवस्था देखी। यहां के जलकूप दुनियांभर में दुर्लभ है।

मकान, हवेलियां व भित्ती चित्र
शेखावाटी के इमारती पत्थरों व चूने से बने मकान अन्य जगहों की तुलना में ज्यादा पुख्ता व बुलंद रहे हैं। वहीं, यहां की हवेलियां मजबूती के साथ कला व सौंदर्य का अद्भुद मिश्रण है। अंचल के 12 शहर हवेलियों व भित्ति चित्रों के लिए प्रसिद्ध है। इनमें फतेहपुर, मंडावा, लक्ष्मणगढ़, रामगढ़, डूंडलोद, चिड़ावा, बिसाऊ व सीकर की हवेलियां दर्शनीय है। जिनकी दीवारों पर देशी रंग से तूलिकाएं चलाकर भारतीय संस्कृति, सभ्यता, धर्म, दैनिक चर्या के अचरज भरे चित्र बनाए गए हैं। जो आज भी देशी विदेशी पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है।

लघु उद्योगों में सिरमौर
शिक्षा व सेना में सिरमौर शेखावाटी के लोग यूं तो बड़े उद्योगपति से लेकर हर सरकारी, प्रशासनिक व तकनीकी पदों पर कायम रहे हैं। लेकिन, यहां का मुख्य व्यवसाय कृषि व लघु उद्योग ही रहा है। झुंझुनूं के ढिगाल व छावसरी गांव मिट्टी के कलात्मक बर्तन, छापोली व बागोरा बांस की टोकरी, डूमरा होजरी, सुल्ताना लोहे के समान, घोड़ीवारा धातू मूर्ति, मंडावा व जसरापुर मुड्ढा निर्माण, सिंघाणा व खेतड़ी पत्थर पर खुदाई, मुकुंदगढ़ कैंची निर्माण, सींगड़ा रस्सी निर्माण, सीकर, झुंझुनूं, मुकुंदगढ़ व नवलगढ़ बंधेज, खंडेला गोटा तथा श्रीमाधोपुर व नीमकाथाना इलाके गलीचा उद्योग के लिए प्रसिद्ध रहे हैं। जो संरक्षण के अभाव में धीरे धीरे दम भी तोड़ रहे हैं।

चंग नृत्य कला:

शेखावाटी की चंग नृत्य कला अनूठी है। रंग रंगीली होली का स्वागत चंग नृत्य के साथ बसंत पंचमी से ही स्वागत करने की परंपरा रही है। जिसमें रसिया गीतों के साथ चंग की थाप व बांसुरी की धुन पर गोल घेरे में धोती-कुर्ता व पगड़ी पहने पुरुषों व झीने घुंघट में ठुमकती मेहरी की थिरकन हर किसी को थिरकने को मजबूर कर देती है।

दुर्ग व छतरी संस्कृति
शेखावाटी सुरक्षा के लिए दुर्ग संस्कृति के लिए प्रसिद्ध है। यहां के पहाड़ी दुर्ग में खेतड़ी का भोपालगढ़, बाघौरगढ़, सीकर का रघुनाथगढ़, देवगढ़, लक्ष्मणगढ़, दांता व रामगढ़, रूपगढ़, कोछोर की पहाड़ी किले तथा मैदानी गढ़ों में सीकर, नवलगढ़, फतेहपुर, मंडावा, डूण्डलोद, मुकुन्दगढ़, सूरजगढ़, बिसाऊ, नेछवा, सिंगरावट, बठोठ, पाटोदा, दांता, खंडेला बड़ा पाना व छोटा पाना प्रसिद्ध है। इसके अलावा राजा महाराजाओं व प्रबुद्ध लोगों की अंत्येष्टि स्थल पर उनकी स्मृति में छतरी बनाने की परंपरा भी यहां रही है।


कला- लीला मंचन:
विभिन्न कलाओं व भगवान की लीलाओं का मंचन भी यहां की संस्कृति की धरोहर है। शारदीय नवरात्रि में सीकर के रामलीला मैदान सहित जगह जगह रामलीला , जन्माष्टमी पर श्रीकृष्ण लीला, दशहरे पर बाय में दक्षिण भारतीय शैली का राम- रावण युद्ध व शिश्यू रानोली में बैसाख में 12 अवतारों वाली नृसिंह लीला सहित विभिन्न मंचन यहां के इतिहास व संस्कृति के प्रमुख आयाम है।


बंदनवार, स्वांग, घूघरी
शेखावाटी में होली खेलने की भी अनूठी संस्कृति है। यहां रामगढ़ शेखावाटी की बांदरवार तोड़ होली, रींगस में मुर्दे की शव यात्रा निकालने, लक्ष्मणगढ़ की घूघरी, उदयपुरवाटी की स्वांग व मंडावा की सूखी होली के रंग में विदेशी तक रंगे नजर आते हैं।

सौहार्द की संस्कृति
अंचल की संस्कृति में सौहार्द का रस हमेशा घुला रहा है। हिंदू व मुस्लिम सहित हर धर्म व संप्रदाय के लोग यहां घुल मिलकर रहे हैं। यहां की हिंदू- मुस्लिम एकता को भारत विभाजन व बावरी मस्जिद कांड भी रत्तिभर प्रभावित नहीं कर पाया। मंदिर की दीवार से सटी कलंदरी मस्जिद, थोरासी में हिंदू समाज द्वारा आयोजित पीर बाबा का मेला, झुंझुनूं की कमरुद्दीन शाह की दरगाह में दिवाली मनाने की परंपरा व पीर के रूप में गोगाजी की पूजा आदि अंचल में सांप्रदायिक सौहार्द की अमिट निशानी बन चुके हैं।


खान पान: गेहूं- बाजरे की रोटी व राबड़ी
शेखावाटी के लोगों का खान-पान मौसम के हिसाब से रहता है। गर्मियों में गेहूं व जौ तथा सर्दी में यहां के लोग बाजरे की रोटी व राबड़ी खाना ज्यादा पसंद करते हैं। शादी के अलावा अन्य आयोजनों व त्योहारों में चूरमा, दाल, बाटी पहली पसंद होती है।

शौर्य की धरती:
शेखावाटी शौर्य की प्रतीक धरा भी है। विदेशी आक्रांताओं से लोहा लेने व स्वतंत्रता आंदोलन में अग्रणी रहने अलावा सरहदों की सुरक्षा के लिए सबसे ज्यादा सैनिक व शहादत शेखावाटी ने ही दी है।