
करगिल दिवस: बारुदी सुरंग से पैर उडऩे पर भी डटे रहे जवान, हौंसला ऐसा कि दुश्मनों को लाठियों से मारने को हो गए थे तैयार
सीकर. आज करगिल दिवस है। करगिल का जिक्र आते ही हमारे जेहन में भारत-पाकिस्तान युद्ध की याद ताजा हो जाती है। भारत- पाकिस्तान युद्ध के बीच 30 दिन चले करगिल युद्ध के बाद आज ही के दिन 26 जुलाई 1999 को भारत को जीत मिली थी। यह दिन विजय दिवस के तौर पर मनाया जाता है। इस युद्ध में शेखावाटी के कई जांबाजों ने देश के लिए अपनी जान गंवाई। तो शेखावाटी के कई फौजियों ने इस युद्ध में अपना योगदान देकर इसके साक्षी बने। युद्ध में सीकर के 7, झुंझुनूं के 18 और चूरू के 6 जवान शहीद हुए थे। शेखावाटी के रणबांकुरों की बात करें तो पलसाना के शहीद सीताराम कुमावत ने जहां अकेले पाकिस्तान तीन चौकियां उड़ा दी थी, तो कई जवानों ने बहादुरी से लड़ते हुए महावीर और वीर चक्र भी हासिल किए।
तंवरावाटी के तीन रण बांकुरों ने पाक को चटाई थी धूल
सीकर जिले के नीमकाथाना के तंवरावाटी क्षेत्र की ही बात करें तो यहां के एक ही बटालियन के तीन रण बांकुरे कारगिल रण में पाकिस्तान को धूल चटा चुके हैं। युद्ध में बिल्कूल प्रतिकूल हालात में भी यहां के महावीर चक्र विजेता दिगेन्द्र कुमार, वीर चक्र जयराम सिंह डाबला, राजेन्द्र सिंह श्यामपूरा ने एक ही बटालियन में रहकर पाकिस्तान को मुंह तोड़ जवाब देते हुए भारत की भूमि को पाकिस्तान के कब्जे से छुड़ाया था। दो राजपूताना रेजिमेन्ट के रण बांकुरे राजेन्द्र सिंह श्यामपूरा उस घड़ी का सीना चौड़ा कर फख्र से जिक्र करते हैं कि युद्ध के दौरान उनका एक पैर बारूदी सुरंग से उड़ गया था। लेकिन, हौंसला हारने की बजाय उन्होंने एक कपड़ा पैर पर कसकर बांध लिया और युद्ध के मैदान में कड़ाई से डट गए थे। पूरी रात वह इसी हालत में दुश्मनों के छक्के छुड़ाते रहे। इसी तरह जाबांज दिगेन्द्र कुमार दुश्मन सामने देखते ही वह उन पर टूट पडऩे का बेताब हो गए और भूखे शेर की तरह उन पर धावा बोल दिया। इसी तरह जवान जयराम सिंह डाबला भी कहते हैं कि पाक में घुसकर दुश्मन को धूल चटाने का वो मंजर वह कभी नहीं भूल सकते।
जब बहादुर सैनिकों ने कहा लाठियों से मार देगें पाकिस्तान को
करगिल युद्ध के गवाह पत्रिका संवाददाता रामावतार सिंह तंवर बताते हैं कि कागरिल क्षेत्र में जब रण चल रहा था तो झांसी स्थित शक्तिशाली आमर््ड डिवीजन अपने रण क्षेत्र रेगिस्तान में कूच करने कि तैयारी कर रहा था। इस डिविजन कि हर रेजीमेन्ट में टैकों की कमी होने से सेना मुख्यालय के निर्देश पर डिविजन का एक सैन्य दल रातों रात महाराष्ट्र स्थित पुना सैन्य आयुध भण्डार से नये टैंक लाने गया। जिसमें वह खुद भी शामिल थे। बकौल तंवर इस सैन्य दल में सभी सैनिक तकनीकी रूप से टैंकों के विशेषज्ञ थे। जिन्होंने पुना आयुध भण्डार सिविलियन टैंकों की खस्ता हालत देखते हुए ले जाने से इन्कार कर दिया। यहां तक कह दिया कि हम दुश्मनों को लाठियों से ही मारकर मैदान जीत लेंगे, लेकिन यह टैंक नहीं ले जाएंगे। मामला सैन्य अधिकारियों के माध्यम से दिल्ली स्थित सेना मुख्यालय पहुंचा। जिसके बाद चेन्नई से रातों रात टैंक विशेष ट्रेन से भेजे गए। जिनकी जांच परख के बाद उसी ट्रेन से उन्हें रण क्षेत्र रेगिस्तान के लिए ले जाया गया।
Updated on:
26 Jul 2020 05:00 pm
Published on:
26 Jul 2020 04:44 pm
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