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जन्माष्टमी विशेष: बंगाल के विष्णुपुर से 1600 किलोमीटर की यात्रा कर सीकर पहुंचे थे भगवान गोपीनाथ

सीकर के सुभाष चौक स्थित मंदिर में भगवान गोपीनाथ को विराजे आज 296 साल हो गए। प्रथम शासक राव दौलत सिंह के समय गोपीनाथजी की यह मूर्ति सबसे पहले एक घास की कुटिया में रखी गई थी।

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सीकर

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Sachin Mathur

Aug 12, 2020

जन्माष्टमी विशेष: बंगाल के विष्णुपुर से 1600 किलोमीटर की यात्रा कर सीकर पहुंचे थे भगवान गोपीनाथ

जन्माष्टमी विशेष: बंगाल के विष्णुपुर से 1600 किलोमीटर की यात्रा कर सीकर पहुंचे थे भगवान गोपीनाथ

सीकर. सीकर के सुभाष चौक स्थित मंदिर में भगवान गोपीनाथ को विराजे आज 296 साल हो गए। प्रथम शासक राव दौलत सिंह के समय गोपीनाथजी की यह मूर्ति सबसे पहले एक घास की कुटिया में रखी गई थी। जिसे राव शिवसिंह ने एक चमत्कार के बाद मंदिर में स्थापित कर राजा घोषित किया था। इसके बाद रियासत के हर शासक ने भी गोपीनाथ को ही राजा कहा-माना। आज भी श्रद्धालु नगर सेठ के साथ भगवान को गोपीनाथ राजा के नाम से पुकारते हैं। गोपीनाथजी की इस मूर्ति का इतिहास औरंगजेब के आक्रमण से भी जुड़ा है। जिससे बचाने के लिए ही यह बंगाल से घास की पोटली में छिपते-छुपाते यहां लाई गई थी। जिसे औरंगजेब के डर से एकबारगी तो वापस भेजने की तैयारी भी कर ली गई थी। इतिहासकार महावीर पुरोहित के मुताबिक औरंगजेब ने 1663 ईस्वी में मामा शाईस्त खान को सूबेदार बनाया। जिसने बंगाल के प्रसिद्ध तीर्थ विष्णुपुर में काले पहाड़ को अधिकारी नियुक्त किया। जिसे यहां के गोपीनाथ मंदिर में लोगों की आस्था खटकने लगी, तो उसने मूर्ति सहित मंदिर को ध्वस्त करने की योजना बनाई। जिसकी जानकारी पर मंदिर के गोस्वामी महंतों ने गोपीनाथजी की मूर्ति घास के गठरों में छुपाई और बैलगाड़ी से वहां से रवाना हो गए। कई राज्यों में शरण के लिए मनाही के बाद वह 1600 किलोमीटर की यात्रा कर सीकर पहुंचे। जहां उन्होंने राव दौलत सिंह के दरबार में पहुंचकर भगवान गोपीनाथ को बसाने की गुजारिश की। इस पर राव दौलत सिंह ने तो औरंगजेब से युद्ध करने में असमर्थता जताते उन्हें जल्द ही रियासत छोड़ देने की बात कह दी, लेकिन वहां मौजूद युवराज शिवसिंह ने जगत को शरण देने वाले भगवान को शरण देने को सौभाग्य बताते हुए पिता को इसके लिए तैयार कर लिया। जिसके बाद गोपीनाथ जी मूर्ति को एक झोपड़ी में विराजित करवा दिया गया।

...और गोपीनाथ जी बन गए सीकर के राजा

इतिहाकारों के अनुसार राव दौलत सिंह के बाद शिवसिंह राव बने तो उन्होंने गोपीनाथजी का बड़ा मंदिर बनाने की योजना बनाई। लेकिन, धन की कमी थी। इसी बीच काबूल से सीकर होकर आगरा जा रहे चांदी लदे ऊंटों को उन्होंने घर आई लक्ष्मी बताते हुए अपने अधीन कर लिया। जिसकी शिकायत दिल्ली दरबार पहुंची तो जां निसार खां की अगुआई में एक सेना सीकर के लिए कूच करवा दी गई। जो जयपुर महाराजा सवाई जयसिंह के हस्तक्षेप से वापस लौट गई। इस संकट को दूर करने में गोपीनाथजी की ही कृपा मानते हुए राव शिव सिंह ने इसके बाद सीकर के परकोटे व हर्ष के शिवालय के साथ गोपीनाथजी का मौजूदा मंदिर बनाया और बंगाल की वही मूर्ति स्थापित कर उन्हें सीकर का राजा घोषित कर दिया। कहते हैं कि तभी से गोपीनाथजी सीकर के राजा कहला रहे हैं।