
एक वचन के लिए राव राजा कल्याण सिंह ने लगा दी थी जान की बाजी, गांधी व बजाज ने की मध्यस्थता
आज सीकर के अंतिम राव राजा कल्याण सिंह की जयंती है। शहर की जनता अमूमन उन्हें उनकी उदारशीलता व दानशीलता के लिए ज्यादा जानती है। लेकिन, आज हम उनसे जुड़ी वो घटना बता रहे हैं जो 'प्राण जाये पर वचन ना जाये' की उक्ति को चरितार्थ करती है। जिसके लिए उन्हें काफी संघर्ष भी करना पड़ा। पेश है उनकी जीवनी पर आधारित विशेष प्रसंग।
बेटे की सगाई पर दिया वचन
इतिहासकारों के अनुसार वर्ष 1933 में कल्याण ङ्क्षसह के बेटे राजकुमार हरदयाल सिंह की सगाई ध्रांगध्रा ( काठियावाड़) की राजकुमारी के साथ हुई थी। लेकिन, सगाई इस शर्त पर हुई कि राजकुमार विवाह से पहले विदेश नहीं जाएंगे। पर फरवरी 1938 में ही कल्याण सिंह को पता चला कि जयपुर के सवाई मानसिंह बेटे हरदयाल सिंह को अपने साथ इंग्लेंड ले जाएंगे। इस बात पर राजा कल्याण सिंह सहमत नहीं हुए और इसकी अनुमति नहीं दी। बावजूद इसके कैप्टन वेब हरदयाल सिंह को परीक्षा समाप्ति से पहले ही अजमेर के मेयो कॉलेज से निकालकर जयपुर ले गए। इसी बात को लेकर सवाई मानसिंह और रावराजा में दूरियां बढ़ गई।
जयपुर बुलाया तो नहीं गए सिंह
इतिहासकारों के अनुसार जयपुर के सवाई मानसिंह सीकर के राजा कल्याण सिंह को कई बार जयपुर बुलाया। लेकिन, वह हर बार किसी ने किसी कारण टालते रहे। इसके बाद जयपुर के इंस्पेक्टर जनरल पुलिस यंग ने सीकर पहुंचे। जिन्होंने देवीपुरा कोठी में वार्ता के लिए बुलाकर राव राजा को गिरफ्तार करने की कोशिश की। लेकिन, कल्याण सिंह सुरक्षित वापस गढ़ तक पहुंचने में सफल रहे। इसके बाद दोनों रियासत में युद्ध के हालात हो गए। राव राजा कल्याण सिंह की रक्षा के लिए प्रमुख जागीरदारों सहित लगभग 30 हजार राजपूत भी सीकर पहुंचे। बाद में सीकर के दरवाजे बंद कर हड़ताल की घोषणा कर दी गई। फतेहपुर, लक्ष्मणगढ़ और रामगढ़ रियासत ने भी साथ दिया।
कस्तूरबा गांधी आई सीकर, बजाज व सिंह की मध्यस्थता से समझौता
इतिहासकारों के अनुसार इसी बीच महात्मा गांधी की पत्नी कस्तूरबा गांधी भी रानी साहिबा से मिलने के लिए सीकर आई। पांच जुलाई को श्रीमाधोपुर तहसील के ग्राम महरोली, मऊ, मुण्डरू, बागरियावास, दिवराला व लिसाडिय़ा के सशस्त्र राजपूत मदद के लिए सीकर रेलवे स्टेशन पर पहुँचे। जयपुर पुलिस ने इन लोगों को हथियार रख लौटने के लिए कहा। इंकार करने पर जयपुर पुलिस ने गोलीबारी शुरू कर दी। इसमें 17 से अधिक लोगों की मौत हो गई और कई घायल हो गए। 19 जुलाई 1938 के कई समाचार पत्रों में छपा कि 'सीकर स्टेशन पर जो हत्याकाण्ड हुआ था, उसके बारे में अब पब्लिक कमेटी को ज्यादा सही हालात मालूम हुए हैं। बाद में जमनानलाल बजाज और नवलगढ़ के मदनसिंह की मध्यस्थता के बाद दोनों पक्षों में समझौता हुआ। राजपरिवार के लोगों ने सीकर की चारदीवारी के प्रवेश द्वार खोल दिए और 23 जुलाई को सवाई मानसिंह जयपुर से हरदयाल सिंह को लेकर सीकर पहुंचे।
Published on:
20 Jun 2022 05:04 pm
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