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World Environment Day: गायब हो रही हरियाली, पृथ्वी के जीवन अस्तित्व पर मंडराता खतरा

संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट के अनुसार हर साल धरती पर से एक प्रतिशत जंगल का सफाया किया जा रहा है।

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story of world environment day special photo of sikar city

विश्व पर्यावरण दिवस विशेष: गायब हो रही हरियाली, पृथ्वी के जीवन अस्तित्व पर मंडराता खतरा

सीकर.

हरे-भरे खूबसूरत पेड़! जहां तक नजर जाएं, वहा तक हरियाली ही हरियाली! कितनी सुखद लगती हैं यह बातें! लेकिन वास्तविकता इससे बिलकुल अलग! अब जंगल साफ किए जा रहे हैं। इसी अनुपात में कंक्रीट के जंगल बढ़ते जा रहे हैं। हालांकि फोरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया 2017 की रिपोर्ट के अनुसार जिले में एक वर्ग किलोमीटर में हरियाली बढ़ी है। लेकिन संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट के अनुसार हर साल धरती पर से एक प्रतिशत जंगल का सफाया किया जा रहा है। सीकर जिले में पिछले एक दशक में वन विभाग ने लाखों रुपए खर्च कर 45 हजार 814 हैक्टेयर में पौधे लगाने के दावे किए, लेकिन उनमें से ज्यादातर पौधों का नामों निशान ही मिट चुका है। इसका मुख्य कारण विभाग की ढिलाई, अवैध कटाई व वन क्षेत्रों पर अतिक्रमण होना है। अधिकारियों का कहना है कि सही वक्त पर संसाधनों की कमी के चलते विभाग चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहा है।


यह है कारण
सीकर जिले के कई इलाके में लोग निर्धारित मात्रा से अधिक नाइट्रेट वाला पानी पी रहे हैं। इसका असर खेती से लेकर जनजीवन तक नजर आ रहा है। हाल यह है कि नीमकाथाना के कई गांवों में पानी में नाइट्रेट 700 मिलीग्राम तक पहुुंच गया है। लक्ष्मणगढ़ इलाके के 53 फीसदी गांवों में नाइट्रेट 250 से 300 मिली ग्राम प्रतिलीटर तक आंका गया है। इस कारण लोग आंतो संबंधी गंभीर बीमारियां की चपेट में आ रहे हैं। सिंचाई के लिए अंधाधुंध कुओं व ट्यूबवैलों की खुदाई के कारण भूमिगत पानी खत्म होता जा रहा है। भूमिगत जल के अधिक दोहन से लवण और क्षारीयता की मात्रा बढ़ गई है। जिले में औसत भू-जल का स्तर 85 मीटर से अधिक नीचे चला गया है। प्रतिवर्ष डेढ़ मीटर से अधिक गहरा हो रहा है। इस पानी से सिंचाई करने से मिट्टी में लवण और क्षारीयता की मात्रा बढ़ जाती है। खेतों में जीवांश की मात्रा कम होने से उत्पादन में भी खासी कमी आ रही है।


फोरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया 2017 की रिपोर्ट
हाल में जारी रिपोर्ट के अनुसार जैसलमेर में 88, बाड़मेर में 86, बूंदी में 82 और जालौर में 77, डूंगरपुर में 41, बीकानेर में 28, गंगानगर में 33, जयपुर में 49, झालावाड में 34, झुंझुनंू में तीन, नागौर में 22, जोधपुर में दस, उदयपुर में 26 , सीकर में 01, राजसमंद में 30, भरतपुर में 13, अजमेर में 13, दौसा में दो वर्ग किमी वन क्षेत्र बढ़ा है। जबकि प्रतापगढ़, बारा, चित्तौरगढ़ और कोटा जैसे जिलों में वन क्षेत्र तेजी से कम हुआ है। वहीं 2015 की रिपोर्ट में अलवर, भीलवाड़ा, बुंदी, चूरू,धौलपुर, डूंगरपुर, झालावाड़, कोटा, राजसमंद, सवाईमाधोपुर, सीकर, टोंक और उदयपुर ऐसे जिले थे, जहां वन क्षेत्र न तो घटा था और न ही बढ़ा था।


जिले की स्थिति
जिले में करीब 639 वर्ग किमी में वन क्षेत्र है। इसका 8.25 फीसदी हरियाली का क्षेत्र है जबकि राज्य वन नीति के अनुसार हरियाली का क्षेत्र 20 फीसदी और केन्द्र के अनुसार 33 फीसदी हरियाली होनी चाहिए। जिले में वन विभाग इसका अधिकांश हिस्सा रक्षित वन क्षेत्र की श्रेणी में आता है। रक्षित श्रेणी के वनक्षेत्र टहनी तोडऩे, मिट्टी उठाने सहित वन सम्पदा को नुकसान पहुंचाने पर वन अधिनियम की अलग-अलग धाराओं में सजा का प्रावधान है। अधिनियम में टहनी तोडऩे पर भी छह माह की कैद है।