13 जनवरी 2026,

मंगलवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

होम

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

वीरभान का बास से बनी शिक्षा की काशी

'शुक्ल पक्ष नवमी तिथि और चैत को मास, दोलो सीकर थरपियो वीर भान के बास

2 min read
Google source verification
sikar birth

सीकर. वीरभान का बास आज शिक्षा की काशी बनता जा रहा है। ३३१ साल के इतिहास में इस वीरभान का बास ने कई बदलाव देखे। कभी छोटे से परकोटे में सिमटा कस्बा आज बड़ा शहर बन गया है। ऊंचाई पर होने के कारण इसे शिखर कहा गया। फिर श्रीकर बना और अब सीकर हो गया। कभी यहां के विद्यार्थी पढऩे के लिए बाहर जाते थे, अब राजस्थान का शायद ही कोई जिला होगा जहां के विद्यार्थी यहां अपना भविष्य संवारने के लिए नहीं आ रहे। राजस्थान के अलावा अनेक राज्यों के विद्यार्थी करियर बनाने के लिए यहां आ रहे हैं। पुराना शहर सात दरवाजों के बीच में बसा हुआ है। जिनमें फतेहपुरी गेट, नानी गेट, बावड़ी गेट, सूरजपोल गेट, पुराना दुजोद गेट, चांदपोल गेट व नया दुजोद गेट शामिल है। इन सात दरवाजों के अंदर सीकर के आराध्य देव गोपीनाथ जी सहित छोटे-बड़े करीब सौ मंदिर हैं।
दोलो सीकर थरपियो...
सीकर की स्थापना को लेकर एक दोहा प्रचलित है। 'शुक्ल पक्ष नवमी तिथि और चैत को मास, दोलो सीकर थरपियो वीर भान के बास। Ó यानी सीकर की स्थापना चैत्र शुक्ल नवमी को संवत १७४४ को राव दौलत सिंह ने की थी। इससे पहले इसका नाम वीरभान का बास था। राव दौलत सिंह ने इस धरती को वीर भूमि मानते हुए इस तिथि को छोटे से गढ़ की नींव रखी।
अब गोपीनाथ ही राजा
राव दौलत ङ्क्षसह के कार्यकाल में ही विष्णुपुर(बंगाल) से गोस्वामी परिवार भगवान गोपीनाथ के विग्रह को लेकर आए। उसके बाद उनके पुत्र शिव सिंह ने अपने शासन काल संवत १७८१ में गोपीनाथ जी के मंदिर का निर्माण करवाया और अपना आराध्य स्वीकार किया। सीकर का स्वामी बनाकर गोपीनाथ राजा कहा गया। अब भी गोपीनाथ को सीकर का राजा ही बोला जाता है।
कल्याण ङ्क्षसह ने दिया शिक्षा व चिकित्सा को महत्व
सीकर के अंतिम शासक राव राजा कल्याण सिंह को लोक कल्याणकारी शासक भी कहा जाता है। उनका शासन ९ जुलाई १९२३ से १५ जून १९५४ तक रहा। कल्याण सिंह ने शिक्षा व स्वास्थ्य के क्षेत्र में कई कार्य किए। कई विद्यालय व अस्पताल खुलवाए। वर्तमान में स्कूल, कॉलेज, अस्पताल व सर्किल कल्याण सिंह के नाम से ही हैं।
अब ध्वस्त हो रहे बुर्ज
स्थापना के बाद ऊंचे टीले पर चार बुर्ज व परकोटा बनाया गया। जिनमें तीन बुर्ज आज भी मौजूद हैं। पश्चिम का एेतिहासिक बुर्ज ध्वस्त हो गया। प्रारंभिक छोटे से गढ़ का मुख्य दरवाजा उत्तर की ओर था, जो आज भी मौजूद है। इस दरवाजे के कपाट दुजोद से लाए गए थे। अब परकोटे में भी नव निर्माण हो रहे हैं। उसे आधुनिक व्यवसायिक इमारतें बनती जा रही है।