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बेहद अनूठा है बाय दशहरा मेला, पूरा गांव राम-रावण की सेना में बंटकर करता है घमासान युद्ध

सीकर जिले का गांव बाय दक्षिण भारतीय संस्कृति पर आधारित सुप्रसिद्ध सजीव दशहरे मेले को लेकर देश में अपनी एक अलग पहचान बना चुका है।

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bay village ravan dahan

खाटूश्यामजी. शेखावाटी के सीकर जिले की दांतारामगढ़ तहसील का गांव बाय दक्षिण भारतीय संस्कृति पर आधारित सुप्रसिद्ध सजीव दशहरे मेले को लेकर देश में अपनी एक अलग पहचान बना चुका है। 163 वर्षों से लगातार चल रही इस परंपरा को यहां के ग्रामीण आज तक संजोकर रखे हुए हैं।

मेले की खास बात यह है कि इसमें रावण के पुतले का दहन नहीं कर राम और रावण की सेना युद्ध स्थल पर एकत्रित होती है। जहां दोनों सेनाओं में घंटों तक घमासान युद्ध होता और अंत में भगवान श्रीराम द्वारा दशानन के अंत के बाद ग्रामीणों द्वारा विजय जुलूस के साथ शानदार आतिशबाजी कर जीत का जश्न मनाया जाता है।

इसके बाद श्री लक्ष्मीनाथ मंदिर के पास संपूर्ण रात्रि नृसिंह लीला में भगवान के 24 अवतारों की जीवंत झांकिया दिखाई जाती है। खास बात यह है कि इस मेले में 100 के करीब स्थानीय कलाकार जिसमें बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक शामिल होते हैं, जो मुखौटा, वेशभूषा साजों श्रृंगार आदि साधन अपने ही खर्च पर वहन करते हंै। कई कलाकार तो पांच दशक से भी ज्यादा तो कई पीढिय़ों से भूमिका निभा रहे हंै। मेले में मुस्लिम समुदाय के लोग भी बढ़चढक़र अपना सहयोग देते हंै।

गजानंद टांक
मैं श्री लक्ष्मीनाथ मंदिर प्रबंधक समिति का अध्यक्ष हूं और बाय में स्थित लगभग 400 वर्ष पुराना भगवान श्री लक्ष्मीनाथ का मंदिर बना हुआ है और यह मूर्ति झुंझुंनू जिले के नवलगढ के गांव चैनपुरा से पाराशर परिवार के पूर्वजों द्वारा लाई गई थी। मंदिर की संपूर्ण व्यवस्था स्थानीय पाराशर परिवार ही देखता है।

गुलाबदीन
मेरे ताऊजी अल्लाहनूर 50 वर्षों से दशहरे पर रावण का रथ तैयार करते थे। उन्होंने बताया कि मेले में मुस्लिम समुदाय के लोग व्यवस्थाओं में बढ़-चढक़र अपनी भागीदारी निभाकर सांप्रदायिक सोहार्द कायम करते हैं। दशहरे को देखते हुए हमारे समुदाय ने 1 अक्टूबर को मोहर्रम मनाने का निर्णय लिया है।

अनिल बैद
मेले के दौरान प्रवासी इस पर्व को सबसे बड़ा मानते हैं। प्रवासी बंधुओं द्वारा भगवान लक्ष्मीनाथ को छप्पन भोग लगाकर ग्रामीणों में प्रसाद वितरित किया जाता है। देश विदेश में रहने वाले बाय प्रवासी इस दिन जरूर दशहरे मेले में आते है और तन मन धन से सहयोग करते है।

मालीराम मेहरा
75 वर्षीय मेहरा तकरीबन 50 वर्षों से विष्णु, हनुमान , शेषावतार, कच्छावतार, मच्छावतार, दुर्गा आदि देवी देवताओं के मुखौटे और झांकिया बनाते हैं। मेहरा ने बताया कि इस कलाकारी को जीवंत रखने के लिए 50 के करीब कलाकारों को तैयार कर चुके हैं।

सोहनलाल
बाय दशहरे पर गांव का बालक, नौजवान और वृद्ध एक स्वयंसेवक बनकर व्यवस्थाओं में सहयोग करता है। इस सहयोग से मेला साल दर साल हाईटेक हो रहा है।

रामगोपाल शर्मा
दशहरे पर मैं राम का अभिनय विगत 30 वर्षों से करता आ रहा हूं। इससे पहले यह पात्र मेरे दादाजी जीवणराम करते थे।

केशर व सोहन लाल
दोनो ही बुजुर्ग साथी तकरीबन 30 वर्षों से बाय दशहरे मेले पर कॉमेडियन का रोल कर दशकों को हंसाने का काम करते हंै।

छगनलाल
80 वर्षीय कुमावत बताते हंै कि जानकीनाथ मंदिर के महंत पण्डित जीवणराम की प्रेरणा से 50 वर्षों से सैकड़ों मुखौटे और झांकियां बना चुका हूं।

उमेश दाधीच
बाय दशहरा मेला विगत 160 से भी अधिक वर्षों से भरता आ रहा है। मेले के दौरान बाय निवासी व प्रवासी एक माह पूर्व ही तैयारियों में जुट जाते हैं। स्थानीय कलाकार स्वयं के खर्चे पर वेषभूषा, साज सज्जा आदि व्यवस्था करता है।

सुनिल खुटेटा
हमारा पूरा परिवार नीमच(एमपी)में कई सालों से रह रहा है और अनाज का व्यवसाय करता है। दशहरे पर लक्ष्मीनाथ बाबा के दर्शन करने आते है। जिससे पूरे वर्ष पर परिवार पर कृपा बरसती है। इस पर्व के लिए एक माह पहले ही बाय आ जाते हंै।