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अमेरिका से इंजीनियरिंग कर देसी गायों पर किया रिसर्च, पांच गुना तक बढ़ाया दूध उत्पादन

youth day special Story : देसी गौ पालन को घाटे का सौदा मानने की सोच अब बदलने वाली है।

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सीकर

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Sachin Mathur

Jan 12, 2024

युवा दिवस विशेष: अमेरिका से इंजीनियरिंग कर हर्षित ने देसी गायों पर किया रिसर्च, पांच गुना तक बढ़ाया दूध उत्पादन

युवा दिवस विशेष: अमेरिका से इंजीनियरिंग कर हर्षित ने देसी गायों पर किया रिसर्च, पांच गुना तक बढ़ाया दूध उत्पादन

देसी गौ पालन को घाटे का सौदा मानने की सोच अब बदलने वाली है। अमेरिका से इंजीनियरिंग करने वाले नवलगढ़ रोड निवासी 25 वर्षीय हर्षित झूरिया ने अपने रिसर्च से देसी गायों के दूध का उत्पादन पांच गुना तक बढ़ा दिया है। अपने अध्ययन व शोध को बढ़ाते हुए अब वह इन गायों को हर किसान और दूध को हर घर तक पहुंचाने की योजना पर काम कर रहा है। लोहागर्ल में फार्म से स्टार्टअप शुरू करने वाले हर्षित की इस उपलब्धि को देखते हुए आईसीएआर ने उसे नस्ल संरक्षण के लिए देश का सर्वोच्च राष्ट्रीय पुरस्कार देना तय किया है। जो किसान दिवस पर शनिवार को हरियाणा के करनाल में दिया जाएगा।

अमेरिका में जाना देसी गाय का महत्व, कोरोना काल में किया शोध

हर्षित ने देसी गाय का महत्व अमेरिका में वर्जीनिया टेक यूनिवर्सिटी से इंजीनियरिंग करते हुए समझा। जहां सेहत के हिसाब से ए-2 दूध की मांग ज्यादा दिखी। जो यूरोपियन के मुकाबले भारतीय देसी गायों मेंं ज्यादा पाया जाता है। इससे हर्षित में भारतीय देसी गायों के प्रति आकर्षण बढ़ा। इसी बीच कोरोना काल में जब वह सीकर में ही रहा तो उसने लोहागर्ल में फार्म स्थापित कर देसी गायों पर शोध शुरू किया।

500 साल पुरानी नस्लें ढूंढी, 25 लीटर तक पहुंचा दूध

इलेक्ट्रिक इंजीनियर हर्षित ने अपने शोध के लिए देसी गायों का पूरा अध्ययन किया। 500 साल पुरानी नस्लों तक का पता कर उसने जैसलमेर, सूरतगढ़, गुजरात सहित अलग- अलग जगहों से गायें व नंदी खरीदे। फिर उनकी ब्रीडिंग व गैर रसायनिक खान- पान पर पूरा ध्यान रखते हुए रिसर्च की अलग- अलग विधियां अपनाई। आखिरकार मेहनत रंग लाई और पांच लीटर तक दूध देने वाली देसी गायें भी अब 25 लीटर तक दूध देने लगी है। फार्म में मुख्य रूप से थारपारकर व साहीवाल नस्ल की गायों के संरक्षण व शोध पर काम हो रहा है।

15 किसानों को मिला नया रोजगार

हर्षित के फार्म में 170 गौवंश है। जिनके चारे के लिए उसने 15 किसानों से संपर्क कर रखा। वे बिना रसायनिक खाद व दवाओं के चारा उगाकर फार्म तक पहुंचाते हैं। इस तरह उन किसानों को भी 20 से 50 हजार रुपए तक महीने की आय हो रही है।

हर किसान के घर गाय, सस्ता दूध पहुंचे हर द्वार
हर्षित अब अमेरिका से एमबीए कर बिजनेस की बारिकियां सीखना चाहता है। ताकि देसी गायों के स्टार्टअप को आगे बढ़ा सके। बकौल हर्षित वह हर किसान के पास देसी गाय पहुंचाने के साथ हर घर तक उनका दूध सस्ती दरों पर पहुंचाना चाहता है।

हरियाणा में मिला सर्वोच्च पुरस्कार

देसी गायों के स्टार्टअप के चलते आईसीएआर ने हर्षित को हाल में किसान दिवस पर सर्वोच्च पुरस्कार से सम्मानित किया था। केंद्र सरकार के राष्ट्रीय गोकुल मिशन के तहत राष्ट्रीय गोपाल रत्न अवार्ड के लिए भारत के पांच अग्रणी शोधार्थियों में भी हर्षित शामिल रह चुका है। हर्षित के पिता भगवान सिंह भारतीय जीवन बीमा निगम झुंझुनूं में विकास अधिकारी व मां डा. सुमन कला कॉलेज में प्रोफेसर है। छोटा भाई भव्य अमेरिका में प्रोजेक्ट मैनेजर है।

रोचक अनुभव: मानवीय संवेदना समझती है देसी गाय
देसी गायों पर शोध में हर्षित को बेहद रोचक अनुभव भी हुए हैं। बकौल हर्षित विदेशी गायों के मुकाबले देसी गायें मानवीय संवेदनाओं को समझती है। उन्हें इंसानों की पहचान होती है। यूरोपियन गायों का दूध मशीन से निकाला जा सकता है, लेकिन देसी गायों का दूध मशीन से निकालना मुश्किल है। वे मानव को उसकी भावनाओं के अनुरूप दूध देते देखी जा सकती है। यही वजह है कि 30 बीघा खेत में वे गायों को प्राकृतिक व पारिवारिक माहौल में बिल्कुल खुला ही रखते हैं।