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मानवीय संवेदनाएं तार-तार : खाट पर बेटी का शव लेकर 30 कि.मी पैदल चलकर पोस्टमार्टम कराने पहुंचा पिता

पोस्टमार्टम का फरमान सुनाकर चलती बनी पुलिस, शव की व्यवस्था कराने पर बनाया बहाना। मजबूरन खाट पर बेटी का शव लेकर 30 किलोमीटर पैदल चले परिजन।

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मानवीय संवेदनाएं तार-तार : खाट पर बेटी का शव लेकर 30 कि.मी पैदल चलकर पोस्टमार्टम कराने पहुंचा पिता

सिंगरौली/ मध्य प्रदेश के सिंगरौली जिले में आमजन के लिए जिम्मेदारों की संवेदनाएं शून्य हो चुकी हैं। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण जिला मुख्यालय से करीब 80 किलोमीटर दूर स्थित निवास चौकी इलाके में देखने को मिला। बेटी की मौत पर दुखी पिता और परिजन को खाट पर उसका शव लेकर करीब 30 किलोमीटर पैदल चलना पड़ा। दरअसल, पुलिस ने पोस्टमार्टम कराने के लिए 30 कि.मी दूर निवास स्वास्थ्य केंद्र तक शव को पहुंचाने की जिम्मेदारी परिजन को ही सौंप दी। लेकिन, इस बात के बारे में जरा भी नहीं सोचा कि, शव पोस्टमार्टम हाउस तक पहुंचाया कैसे जाएगा।

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PM हाउस तक शव पहुंचाने में लगे 7 घंटे

निवास चौकी क्षेत्र के गड़ई गांव निवासी धीरपति सिंह गोंड को उनकी 16 वर्षीय बेटी का शव पोस्टमार्टम हाउस तक पहुंचाने को कहा गया, लेकिन उन्हें न ही कोई एंबुलेंस मुहैया कराई गई और न ही शव वाहन। आर्थिक रूप से अक्षम पिता ने बेटी शव खाट पर रखकर परिजन की मदद से निवास स्वास्थ्य केंद्र में स्थित पोस्टमार्टम हाउस तक पहुंचाया। रास्ते भर जिसने भी ये मंजर देखा, वो हतप्रभ रह गया। धीरपति व उनके परिजन को पोस्टमार्टम हाउस तक शव पहुंचाने में 7 घंटे का समय लगा। सुबह 9 बजे से खाट पर शव लेकर गांव से निकले धीरपति शाम 4 बजे स्वास्थ्य केंद्र पहुंच सके। बता दें कि, मानवीय संवेदनाओं को तार-तार कर देने वाला ये मामला 6 मई का है।

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मानसिक विक्षिप्त लड़की ने फांसी लगाकर कर ली थी आत्महत्या

पिता धीरपति के मुताबिक, उनकी मानसिक रूप से विक्षिप्त बेटी पार्वती ने 5 मई की देर रात फांसी के फंदे पर झूलकर आत्महत्या कर ली थी। घटना की सूचना पाकर मौके पर पहुंची पुलिस ने कागजी कार्रवाई पूरी करने के बाद परिजन को शव पोस्टमार्टम हाउस तक पहुंचाने का हुक्म सुनाकर घटना स्थल से चलती बनी। उसके बाद मजबूर पिता और परिजन को बेटी का शव खाट पर रखकर ले जाना पड़ा।


ग्रामीणों को अब तक बताया ही नहीं, कि ये दायित्व किसका है

धीरपति ने बताया कि, उसके गांव से करीब एक किलोमीटर पहले तक सड़क है। वहां से कोई वाहन उपलब्ध करा दिया जाता, तो उन्हें इस परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता। इस मामले में चौकी प्रभारी अरूण सिंह का कहना है कि, पोस्टमार्टम हाउस तक शव पहुंचाने के लिए कोई बजट अलॉट नहीं होता। ऐसे में वाहन की व्यवस्था कर पाना उनके लिए मुम्किन नहीं था। वहीं, दूसरी तरफ गांव के लोगों का कहना है कि, पोस्टमार्टम कराना हमारा ही दायित्व है। ये कार्य तो हम आजादी के बाद से अब तक यूं ही करते आ रहे हैं। यानी साफ है कि, इन लोगों को अब तक बताया ही नहीं गया कि, शव का पोस्टमार्टम कराने की जिम्मेदारी आखिर होती किसकी है।

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