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एनसीएल की निगाही परियोजना ने कागजों में लगा दिए 7 करोड़ के पौधे

पर्यावरण के साथ मजाक, सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता अश्वनी दुबे की ओर से सूचना अधिकार अधिनियम 2005 के तहत मांगी गई जानकारी के आधार पर यह बात सच दिखती है।

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Suresh Kumar Mishra

Sep 09, 2016

NCL's Nigahi project

NCL's Nigahi project


सिंगरौली।
एनसीएल की निगाही परियोजना में बीते 12 साल के दौरान सात करोड़ रुपए से ज्यादा की लागत से पेड़ लगाए गए हैं। यह बात आपको हैरान करेगी। सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता अश्वनी दुबे की ओर से सूचना अधिकार अधिनियम 2005 के तहत मांगी गई जानकारी के आधार पर यह बात सच दिखती है।


यह जानकारी पर कोल इंडिया लिमिटेड के केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी ने दी है। जिसमें 12 साल की सालवार जानकारी है। हैरत की बात यह कि जब एनसीएल की एक परियोजना में इतनी भारी-भरकम रकम से पेड़ लगाए गए हैं तो बाकी परियोजनाओं पर कितने खर्च किए गए होंंगे? हालांकि सच्चाई इसके ठीक उलट है।


जनता के खून पसीने से कमाई

समूचे क्षेत्र का भ्रमण करने के बाद भी आपको ऐसा नहीं लगेगा कि सिर्फ पेड़ लगाने पर इतनी रकम खर्च कर दी गई होगी। आपको लगेगा कि पर्यावरण संरक्षण के नाम पर कंपनी कू्रर मजाक कर रही है। जनता के खून और पसीने से कमाई गई रकम को पानी की तरह किस तरह बहाया जा सकता है। यह बात कोई एनसीएल के अधिकारियों से सीखे।


चिलबिल के पेड़ों की तादाद ज्यादा

निगाही परियोजना के समूचे क्षेत्र को घूमने पर चिलबिल के पेड़ों की तादाद ज्यादा दिखती है। दूसरे नंबर पर यूके लिप्टस के पेड़ हैं। जबकि इन दोनों किस्म के पेड़ों से पर्यावरण संरक्षण को कोई वास्ता नहीं है। वैज्ञानिक तौर पर पहले ही साबित हो चुका है कि यूके लिप्टस के पेड़ पर्यावरण के लिए नुकसानदायक होते हैं। यूके लिप्टस का एक पेड़ प्रतिदिन 80 लीटर पानी सोखता है।


एनसीएल प्रबंधन गंभीर नहीं

कुछ इसी तरह की स्थिति चिलबिल के पेड़ों की भी है। निगाही परियोजना में जो ओवर बर्डेन डंप किए गए हैं। उन पर भी पेड़ नहीं लगाए गए हैं। कहीं-कहीं झाडिय़ां खुद उग आई हैं। इससे यह साबित होता है कि एनसीएल प्रबंधन पर्यावरण संरक्षण को लेकर गंभीर नहीं है। पर्यावरण संरक्षण के नाम पर सिर्फ कागजी घोड़ दौड़ा रहा है।


समूचा सिंगरौली औद्योगिक क्षेत्र पर्यावरण प्रदूषण से जूझ रहा है। कंपनियां कागजों में पेड़ लगाकर कोरमपूरी कर रही हैं। सात करोड़ की लागत से लगाए गए पेड़ कहीं दिखते नहीं हैं। समस्या इस बात की है कि पर्यावरण संरक्षण के नाम पर कब तक कंपनियां जनता को बेवकूफ बनाती रहेंगी।

अश्वनी दुबे पर्यावरणविद् व अधिवक्ता

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