
singrauli coal mines
सिंगरौली. सिंगरौली का नाम जेहन में आते ही कोलमाइंस की तस्वीरें आंखों में तैरने लगती हैं। जी हां, देश की ऊर्जाधानी के नाम से मशहूर सिंगरौली जिले में कोलमाइंस का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है। इधर, बस्तियां सिमटती जा रही हैं। कुछ परिवार तो कई बार विस्थापित हो चुके हैं। प्रदूषण का ग्राफ भी लगातार बढ़ रहा है। जिले की सीमा में प्रवेश करते ही भारी वाहनों की आवाजाही दिखने लगती है। कंपनियों को अधिक कोल उत्पादन के लक्ष्य दिए जा रहे हैं। विकास की अंधाधुंध दौड़ में लोगों की जिन्दगी सिमटकर रह गई।
जिले में कोलमाइंस का बिछा जाल
जिले में एनसीएल समेत निजी कंपनियों की 12 कोलमाइंस मौजूदा वक्त में संचालित की जा रही हैं। जिसमें एनसीएल की निगाही कोलमाइंस सबसे बड़ी है। जिसकी वार्षिक उत्पादन क्षमता 18.25 एमटी है। साथ ही मझोली स्थित जेपी कोलमाइंस और रिलायंस कंपनी की मुहेर एण्ड मुहेर कोलमाइंस हैं।
जमीन तो ले लिया, मकान का नहीं मिला मुआवजा
जिला मुख्यालय के महज पांच किमी दूर बसे अमझर गांव के लोग दहशत में जीने को मजबूर हैं। करीब 35 साल पहले एनसीएल ने जमीन अधिग्रहित कर ली। जिसका मुआवजा भी मिल गया। मगर, मकान का मुआवज अब तक नहीं मिला। लोग मकान बनाकर रह रहे हैं। जबकि यह बस्ती नगर निगम के वार्ड क्रमांक 25 में आती है। यहां आबादी करीब तीन हजार के आसपास है।
बस्ती के पास ही ओबी के कई पहाड़ खड़े हैं। मौजूदा वक्त में लोग प्रदूषण से ग्रसित हैं। प्रदूषण के चलते इस गांव के कई लोग टीबी जैसी संक्रमित बीमारियों से दम तोड़ चुके हैं। ज्यादातर लोग इसी बीमारी से ग्रसित हैं। लोगों का कहना है कि मकान का पट्टा न होने से सरकार की योजनाओं का लाभ नहीं मिल रहा है।
कन्वेयर बेल्ट लगाकर भूल गए पेड़ लगाना
पहले जिदंगी बहुत अच्छी थी। खेत लहलहाते थे, फसल ठीक होती थी तो पैसा और अन्न की कोई कमी नही थी। घर के सब खुश थे लेकिन सासन पावर परियोजना में जमीन क्या गई हमारी जिंदगी नरक हो गई है। कोल खदान के बीच प्रदूषित हवा और सूखे खेतों में घर में भुखमरी जन्म ले चुकी है। कागजों पर विस्थापित तो कर दिए गए पर हक के लिए लड़ने को मजबूर हैं। यह दर्द अमलोरी बस्ती के लोगों का है। जिन्होंने पत्रिका को सुनाया।
शर्त के अनुसार,सासन पॉवर को कन्वेयर बेल्ट के दोनों तरफ सघन वृक्षारोपण करना था। मगर, इतने साल बीत जाने के बाद भी पेड़ नहीं लगाये गए। नतीजतन कन्वेयरबेल्ट के दोनों तरफ की फसलें कोयले की वजह से हर साल बर्बाद हो जाती हैं। गांव के जयबिंदु ने बताया कि वर्ष 2012 में उनके परिवार की 33 एकड़ जमीन कंपनी ने अधिग्रहित की गई। बौध भारतीय, प्रमोद, लक्ष्मी नारायण, राजू भारतीय, विनोद भारतीय, दिनेश, राजकुमार सहित कुल 10 लोगों की जमीन शामिल थी।
कंपनी ने नौ लाख रुपए प्रति ढाई एकड़ के हिसाब से जमीन का मुआवजा दिया। लेकिन ढाई एकड़ जमीन को जंगल विभाग में दिखा दिया। कच्चे मकानों का मुआवजा भी जैसे-तैसे दिया। यहां तक तो ठीक रहा लेकिन कंपनी ने एग्रीमेंट में परिवार के एक सदस्य को नौकरी देने का वायदा किया था। मकान के बदले प्लाट देने की बात कही थी। पांच साल हो गए हैं एक भी सदस्य को नौकरी नहीं दी है। ढाई एकड़ जमीन का मुआवजा भी बाकी है। जिसके लिए कंपनी से लड़ रहे हैं। कलेक्टर से कई बार गुहार लगा चुके हैं। पर कोई सुनवाई नहीं होती है।
कंपनी के रसूख के आगे प्रशासन भी खामोश है। केवल जयबिंदु और उनका परिवार ही कंपनी के वादाखिलाफी की लड़ाई नहीं लड़ रहा है बल्कि और भी ग्रामीण हैं जो संघर्ष कर रहे हैं। हालात ये हैं कि घरों तक आने-जाने के लिए कच्चे उबड़-खाबड़ रास्ते ही हैं।
कंपनी मालामाल, हम लाचार
जयबिंदु ने कहते हैं कि 33 एकड़ जमीन देने के बाद उनके परिवार में महज 6 एकड़ जमीन बची है। जिसमें फसलें बामुश्किल हो पाती हैं। परिवार के भरण-पोषण का सवाल भी खड़ा है। अन्न के दाने-दाने को मोहताज हो रहे हैं। उधर कंपनी उनसे ली गई जमीन से करोड़ों रुपए कमा रही है।
हैवी ब्लास्टिंग से क्रेक हो रहीं दीवारें
कोल खदान महज चंद कदमों की दूरी पर है। मकान और खदान के बीच एक बाउंड्रीवाल का फासला है। हैवी ब्लास्टिंग की जाती है। जिससे दीवारें क्रके हो जाती हैं। ऐसी दहशत है कि लोग ब्लास्ट के वक्त घर छोड़ बाहर खड़े रहते हैं। भकुआर के दिनेश पाण्डेय बीते चार साल से हैवी ब्लास्टिंग से जर्जर हुए मकान का मुआवजा के लिए भटक रहे हैं।
एनसीएल की खदानें वार्षिक उत्पादन क्षमता (एमटी में)
अमलोरी 13.00
बीना 7.5
दुधिचुआ 17.00
जयंत 17.00
झिंगुरदा 2.50
ककरी 2.10
खडिय़ा 10.25
निगाही 18.25
कृष्णशिला 7.00
ब्लाक बी 5.40
Updated on:
08 Jun 2018 01:14 pm
Published on:
08 Jun 2018 01:11 pm
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