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गांव के पांव : राशन मिलने तक सीमित सरकारी मदद

जिले के आदिवासी क्षेत्रों के रहवासियों का हाल....

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The pain of residents of tribal areas of Singrauli district

The pain of residents of tribal areas of Singrauli district

सिंगरौली. लॉकडाउन से पहले सूरज की लालिमां निकलती थी और आदिवासी परिवार मजूदरी करने के लिए जाने की तैयारी करता था। रोज मजदूरी करके पेट भरने वाले आदिवासी क्षेत्र के रहवासियों की जरूरतें तो बहुत कुछ हैं। लेकिन सरकारी मदद महज राशन मिलने तक सीमित है। यह हाल जिले के आदिवासी परिवारों का है। बात करें बरहवा टोला के बैगा बस्ती की, तो यहां के बैगा बस्ती का दर्द ही कुछ अलग है।

लॉकडाउन के इस दौर में आदिवासी परिवार की जिंदगी थम सी गई है। सरकार अनाज तो दे रही है मगर, इसके साथ अन्य सामग्री के लिए आदिवासी क्षेत्र तरस रहा है। बस्ती के लोगों का कहना है कि केवल अनाज से भूख नहीं मिटेगी। बल्कि इसके साथ दाल व सब्जी सहित अन्य सामग्री की जरूरत रोज पड़ रही है। जैसे-तैसे करके महीना कट गया है। इसके साथ ही आदिवासी क्षेत्र के रहवासियों की दिनचर्या भी बदल गई है।

अभी तक कुछ नहीं मिला
सरकार मदद तो कर रही है मगर, अभी तक कुछ नहीं मिला है। सुनने को मिला है कि गरीब व किसानों के खाते में सरकार पैसा दे रही है। पैसे निकालने के लिए कई बार बैंक में गया लेकिन बैंककर्मी यही बताते हैं कि खाते में पैसा नहीं आया है। वहीं बैंक में जब कुछ लोगों से इसके बारे में पता करता हूं तो यही सुनने को मिलता है कि हमारे खाते में पैसा आ गया है। अनाज के अलावा अन्य सामग्री खरीदने में परेशानी हो रही है। - देवलाल बैगा

झेलनी पड़ रही परेशानी
जबसे लॉकडाउन घोषित हुआ है तब से घरेलू सामग्री के लिए परेशानी झेल रहे हैं। इससे पहले रोज मजदूरी करने पर पैसे मिल जाते थे। जिससे अपना काम चलता था लेकिन इस दौरान चारों तरफ से परेशानी है। कोरोना संक्रमण से बचने के लिए घरों में रहना भी विशेष जरूरी है। धीरे-धीरे करके एक महीने का समय बीत गया है अभी कुछ दिनों तक इसी तरह गुजारा करना होगा। इससे सभी लोग सुरक्षित रहेंगे। - हरिप्रसाद बैगा

कुछ नहीं मिला सहयोग
तीन महीने का राशन मिल गया है लेकिन जो राशन नि:शुल्क मिलना है। अभी तक नहीं मिला है। इसके अलावा पंचायत की ओर से कुछ सहयोग नहीं मिला है। कोराना खतरनाक बीमारी है इसके संक्रमण से बचने के लिए लोगों को मास्क व सेनेटाइजर पंचायत सहित स्वास्थ्य विभाग को वितरित करना चाहिए। मगर, एेसा कुछ नहीं हुआ है। आदिवासी क्षेत्रों की ओर किसी की नजर नहीं पहुंचती है। - रामदयाल बैगा