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खुशखबर: सिरोही जिले में पहली बार दिखे दुर्लभ प्रजाति के इंडियन स्कीमर

इंडियन स्कीमर पक्षी राज्य के धौलपुर क्षेत्र चंबल राष्ट्रीय अभयारण्य में देखे जाते थे। जिससे बाहर निकलकर पहली बार सिरोही में इनकी उपस्थिति सुखद भविष्य का संकेत बताया जा रहा है।

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इंडियन स्कीमर

माउंट आबू। सिरोही जिले में पहली बार दुर्लभ प्रजाति के इंडियन स्कीमर दिखने से पर्यावरण व पक्षी प्रेमियों में खुशी की लहर दौड़ गई। पक्षी प्रेमी व बर्ड वॉचर साहिल जुत्सी के अनुसार जिले के पठारी क्षेत्रों की तलहटी के तराई के आस-पास जलाशयों में हाल ही में पहली बार दुर्लभ प्रजाति का इंडियन स्कीमर पक्षी का जोड़ा देखा गया। जिससे इस क्षेत्र के विशेषकर जलीय पक्षियों की संख्या में इजाफा होने सहित अन्य कई दुर्लभ प्रजातियों के पक्षियों के भी कलरव सुनाई देने की संभावनाएं बलवती हुई है। कुछ महीने पूर्व माउंट आबू में पहली बार लिटिल बंटिंग पक्षी देखे जाने से पक्षियों पर शोध करने वाले लोग आल्हादित हो गए थे।

इंडियन स्कीमर की उपस्थिति सुखद संकेत

बर्ड वॉचर जुत्सी के अनुसार इंडियन स्कीमर पक्षी राज्य के धौलपुर क्षेत्र चंबल राष्ट्रीय अभयारण्य में देखे जाते थे। जिससे बाहर निकलकर पहली बार सिरोही में इनकी उपस्थिति सुखद भविष्य का संकेत बताया जा रहा है। चंबल अभ्यारण्य में बहती नदी में स्वच्छ पानी के साथ जहां पानी धीमी गति से बहता हो, वहां मछलियों का शिकार करने की फिराक में झुंड में इंडियन स्कीमर उड़ते दृष्टिगोचर होते हैं।

इस क्षेत्र में पानी के साथ झाड़ियां, हरियाली, व्यापक स्तर पर रेतीला इलाका विद्यमान है, जो इंडियन स्कीमर को आकर्षित करता है। यह पक्षी अक्सर एक-दो जोड़े में ही देखे जाते हैं। किसी विशेष अवसर में ही यह झुंडों में दिखाई देते हैं। यही वजह है कि जिले के एक जलाशय में जोड़े के रूप में इन्हें देखा गया। जिले में इनकी संख्या बढ़ने की व्यापक संभावनाएं हैं।

कैंचीनुमा चोंच मुख्य पहचान

सरसरी तौर पर देखे जाने से सामान्य लोग इंडियन स्कीमर को टिटहरी जैसा ही समझ लेते हैं। इसी भ्रम में वे इसे टिटहरी मान लेते हैं। जबकि यह पक्षी टिटहरी से आकार में बढ़े होते हैं। इनकी लंबी, नुकीली चोंच ऊपर की छोटी व नीचे की लंबी कैंची नुमा होती है। इसी वजह से इसे पूर्व में इंडियन सीजेवल नाम से जाना जाता था।

माउंट आबू में नहीं है नहीं स्कीमर के ठहराव का वातावरण

पक्षियों पर शोध कर रहे जुत्सी ने बताया कि बर्ड वॉचर ई.ए. बटलर ने अपने शोध पत्र में माउंट आबू में उन्नीसवीं सदी में इंडियन स्कीमर को देखे जाने का जिक्र किया था, लेकिन बाद में एक अन्य शोधकर्ता ए.ओ. ह्यूम ने इसकी कोई प्रमाणिकता नहीं होने से पूर्ववर्ती शोध को सिरे से खारिज कर दिया था। वैसे भी माउंट आबू का समूचा पठारी क्षेत्र इंडियन स्कीमर के लिए उपयुक्त नहीं है।

पानी को छूते हुए भरते हैं उड़ान

यह पक्षी स्वच्छ व धीमी गति से चलने वाले पानी को छूते हुए उसकी सतह से तेज गति से उड़ान भरते हैं। दूर से देखने पर ऐसा प्रतीत होता है कि यह पक्षी पानी पर तेज गति से तैर रहा हो। वास्तव में वे उड़ रहे होते हैं।

ऐसे किया जाता है प्रमाणित

जुत्सी ने बताया कि किसी भी बर्ड वॉचर को जब नई प्रजाति के जलीय पक्षी दृष्टिगत होते हैं तो उन्हें प्रमाणित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय ई बर्ड एंजेसी को उनका पुख्ता विवरण प्रस्तुत करना होता है। जहां से मान्यता मिलने के बाद ही नई प्रजातियों के पक्षियों की खोज प्रमाणित होती है।