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मशहूर अ​भिनेता-कवि शैलेश लोढा बाेले- राजनीति में आने से अब तक तो इनकार किया, आगे ईश्वर तय करेगा

शैलेश लोढा बाेले, सिरोही की गलियां, बचपन के दोस्त, कॉलेज लाइफ... कभी नहीं भूल सकता राजस्थान पत्रिका से विशेष बातचीत में पुरानी यादों को किया ताजा, बोले, बचपन के दोस्तों और मारवाड़ को नहीं भूल सकता लोकप्रिय अभिनेता व हास्य कवि शैलेश लोढा का सिरोही में 6 बाई 6 के कमरे से माया नगरी मुम्बई तक का सफर  

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सिरोही। अपनी कविताओं व अभिनय कला से दुनियाभर में मशहूर अभिनेता, लेखक व हास्य कवि शैलेश लोढ़ा का कहना है कि वे एक कलाकार है, राजनीतिक व्यक्ति नहीं। बचपन से उनके जेहन में एक कलाकार बसता है। आज जो कुछ भी हैं, कविता की बदौलत है। राजनीति में आने का पहले मौका भी मिला था, इसके लिए मैं स्वयं को सौभाग्यशाली मानता हूं कि मुझे इस लायक समझा, लेकिन अब तक तो मैंने इनकार ही किया है, अब आगे ईश्वर चाहेगा, वो होगा। वैसे भी करियर को लेकर मैनें कभी प्लानिंग नहीं की। आगे भी कहां जाना है और क्या करना है, यह सब ईश्वर तय करेगा।

कवि लोढ़ा हर साल की तरह इस बार भी बसंत पंचमी को सिरोही जिले के अजारी में मां सरस्वती मंदिर में दर्शन करने पहुंचे। लौटते वक्त सिरोही में हुई खास मुलाकात के दौरान कवि शैलेष लोढा ने कविता, अभिनय, राजनीति, अपणायत से जुड़ी कई बातें साझा की। राजस्थानी माटी में जन्में कवि शैलेष की राजस्थान पत्रिका से हुई विशेष बातचीत के अंश---

सिरोही की गलियां, बचपन के दोस्त, कॉलेज लाइफ...कभी नहीं भूल सकता

कवि शैलेष लोढ़ा ने कहा कि सिरोही मेरी कर्म भूमि रही है और मेरा इससे विशेष मोह है। यहां पला और बढ़ा हुआ। यहां की गलियां, बचपन के दोस्त, चाय की होटल, स्कूल और कॉलेज लाइफ हमेंशा याद आते हैं। सिरोही मेरी जिन्दगी की पाठशाला है। जन्म जोधपुर में हुआ, लेकिन जिन्दगी का सबसे अहम पड़ाव ननिहाल सिरोही में बीता है। कक्षा 7वीं से लेकर एलएलबी तक की पढ़ाई यहां की है, छात्र आंदोलनों में भी भाग लिया।

बालकवि के रूप में करियर की शुरुआत भी यहीं से की है। मैं सिरोही और यहां के लोगों को कभी भूल नहीं सकता। लोढ़ा ने बताया कि सिरोही में उन्होंने करीब 10-12 साल व्यतीत किए हैं। उन्होंने 1980 से लेकर 1990 तक की यादें ताजा की। कहा कि यहां की हर गली और चौराहे से अच्छी तरह वाकिफ है। जीवन में सीखने का काल यहीं से शुरू हुआ है।


बचपन के दोस्तों और मारवाड़ को नहीं भूल सकता

कवि लोढ़ा ने कहा कि पेड़ तब तक ही खड़े हैं, जब तक अपनी जड़ों से जुड़े हैं। जिस दिन जड़ें छोड़ दी, तो तनकर खड़े नहीं हो पाएंगे। इसलिए जड़ों से जुड़े रहना जरूरी है। मैंने सातवीं में सरकेएम स्कूल में दाखिला लिया और बारहवीं तक की पढ़ाई की। इसके बाद सरकारी कॉलेज से ग्रेजुएशन और एलएलबी सैकण्ड ईयर तक की पढ़ाई भी सिरोही में ही की। इस दौरान खूब सारे दोस्त बने। बकौल लोढ़ा- बचपन के दोस्तों को कैसे भूल सकता हूं। मारवाड़ व मारवाड़ी को कभी नहीं भूल सकता। यहां अनगिनत दोस्त है। उनसे आज भी मारवाड़ी में ही बात करता हूं।


मुझे समझदार जीवनसाथी मिली...

उन्होंने एक सवाल के जवाब में कहा कि जब भी परिवार को जरूरत होती है समय देता हूं। वैसे काव्य पाठ के लिए दुनिया में घूमता हूं और सीरियल में भी व्यस्त रहता हूं। मैंने ईश्वर से समझदार पत्नी मांगी थी और मेरी जीवनसाथी डॉ. स्वाति लोढ़ा समझदार है, वो मुझे समझती है। कभी कोई दिक्कत नहीं आती। वैसे हम तय करके चलते हैं तो कभी कोई मुश्किल नहीं होती। जैसे मेरा हर साल बसंत पंचमी को सरस्वती मंदिर में दर्शन करना तय है।


सिरोही के दोस्तों को मैं फोन करता रहता हूं...

कवि लोढा ने कहा कि आदमी को कहना ही नहीं चाहिए कि समय की कमी है। मेरे पुराने मित्र यहां बैठे हैं। मैं आज भी इन्हें चलाकर फोन करता हूं। शायद ये मुझसे ज्यादा बिजी है। वक्त निकालना चाहे तो निकल सकता है। क्वांटिटी टाइम नहीं मिलता, लेकिन क्वालिटी टाइम तो निकलता है।

दोस्तों संग थड़ी पर पीते थे चाय

उन्होंने कहा कि सिरोही से बचपन और युवावस्था की यादें जुड़ी है। दोस्तों संग पढऩा और चाय की थड़ी (होटल) पर चाय पीना आज भी जेहन में है। उन्होंने बाकायदा अपनी टी स्टॉल का जिक्र भी किया। कहा कि यहां की चाय का जायका ही अलग है। यहां चाय पीने रोज जाते, बैठते और बतियाते अच्छा लगता था।


10 साल की उम्र में बाल कवि की मिली उपाधि, सुमेरपुर से काव्य पाठ की शुरुआत

उन्होंने कहा कि कविता का बचपन से ही शौक रहा है। बचपन से मेरे जेहन में बाल कवि बसता था। स्कूल से लेकर कॉलेज तक कई प्रतियोगिताएं जीती। पहली बार 1980 में बाल कवि के रूप में सुमेरपुर में कवि सम्मेलन में शिरकत की। राष्ट्रीय स्तर तक की डिबेट यहां से जीती। सही मायने में जेहन में कविता का जुनून भी यहीं से जागा। जब कच्ची उम्र में कोई बच्चा पक्की बात करता है तो लोगों को अच्छा लगता है। मेरी कविता सुनकर लोगों को बड़ा मजा आता था, यहीं से लोकप्रियता मिली। मैंने उस जमाने के कई दिग्गज लोगों को बड़े नजदीक से देखा है।


छपे अक्षरों से दूर हो रहे युवा, बड़ा दुख होता है...

कवि शैलेष लोढा ने कहा कि डब्ल्यूबीएम कार और आईफोन जिन्दगी नहीं है। ऐसा नहीं है कि तीन लाख के फोन से संप्रेषण अच्छा होता है। पत्र-पत्रिकाएं, किताबें हर रोज पढऩी चाहिए। इनसे ज्ञान मिलता है। आज का युवा छपे अक्षरों से दूर हो गया है, यह देखकर बड़ा दुख होता है। युवाओं का किताबों से मोहभंग होना गलत है। मैं इतनी व्यस्तता के बाद भी सफर के दौरान पत्र-पत्रिकाएं जरूर पढ़ता हूं, ऑनलाइन राजस्थान के पेपर पढ़ता हूं।


5 हजार एपिसोड किए, 700 से अधिक नए कलाकारों को मौका दिया

कवि लोढ़ा ऐसे अभिनेता है, जिन्होंने अलग-अलग शोज के करीब 5 हजार एपिसोड किए हैं। वाह-वाह क्या बात है, कॉमेडी सर्कस, नुक्कड़ के शेर सहित कई शोज, कविताओं के प्रोग्राम शामिल है। वाह वाह क्या बात है के 400 एपिसोड पूरे हो चुके हैं। वे अब तक 700 से 800 नए कलाकारों को अभिनय का मौका दे चुके हैं। उन्होंने कहा कि अब आगे भी नए कलाकार मिलेंगे तो उनको मौका दिया जाएगा।