14 फ़रवरी 2026,

शनिवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

राजस्थान के Mahendra Munot ने नौकरी के लिए घर छोड़ा, कर्नाटक में उधार ले लगाई दुकान, आज दान-पुण्य में खर्च कर रहे करोड़ों रुपए

राजस्थान के पाली जिले के लांबिया निवासी मुहेन्द्र मुणोत ने मारवाड़ से ढाई हजार किलोमीटर दूर कर्नाटक की धरती पर पहुंचकर अपना लोहा मनवाया। नौकरी की तलाश में दिसावर गए। अब वे मारवाड़ का नाम रोशन कर रहे हैं।

2 min read
Google source verification
Mahendra Munot

सिरोही। कठिन परिश्रम, कर्मनिष्ठा और उत्कंठा ही इंसान को फर्श से अर्श तक पहुंचाती है। कुछ कर गुजरने का जज्बा हो तो किसी भी इंसान को अपनी मंजिल तक पहुंचने से कोई रोक नहीं सकता। इसी तरह के जज्बे से बुलंदियां छूने वाले शख्स है पाली जिले के लांबिया निवासी मुहेन्द्र मुणोत। उन्होंने मारवाड़ से ढाई हजार किलोमीटर दूर कर्नाटक की धरती पर पहुंचकर अपना लोहा मनवाया। नौकरी की तलाश में दिसावर गए। अब वे मारवाड़ का नाम रोशन कर रहे हैं।

मुणोत आठवीं तक अपने गांव में लांबिया में ही पढ़े। 10वीं तक राणावास में पढ़ाई की। घर की आर्थिक स्थिति डांवाडोल हुई तो काम की तलाश में वर्ष 1983 में दिसावर का रुख किया। पांच साल तक मेडिकल स्टोर पर नौकरी की और फिर 4 हजार रुपए उधार लेकर खुद की छोटी-सी मेडिकल की दुकान लगाई।

रात-दिन परिश्रम किया। 14 साल तक गांव की तरफ झांका भी नहीं। कड़ी मेहनत और निष्ठा के बूते आज वही शख्स कर्नाटक की धरती पर बड़े व्यापारी, भामाशाह और समाजसेवी के रूप में पहचाने जाते हैं। लाखों-करोड़ों रुपए तो हर साल सेवा और दान-पुण्य में खर्च करते हैं।

गांव में अस्पताल बनवाया, बच्चों को बांटते हैं नि:शुल्क किताबें

मुणोत समाजसेवा में भी आगे रहते हैं। उन्होंने लांबिया गांव में पशुओं के लिए अस्पताल बनवाया। गोशालाओं में हर साल लाखों रुपए दान-पुण्य करते हैं। कर्नाटक की सरकारी स्कूलों में जरूरतमंद बच्चों को हर सालों लाखों किताबें नि:शुल्क बांटते हैं। गायोें की सेवा में उनका विशेष लगाव है। दुर्घटनाग्रस्त गायों को अस्पताल पहुंचाने के लिए एम्बुलेंस लगा रखी है। लांबिया गांव में भी वे जनसहयोग के लिए हरसंभव अग्रणी रहते हैं। ग्रामीण संस्कृति से जुड़े हुए हैं।

जीओ और जीने दो तथा सेवा ही जीवन का ध्येय

उन्होंने भगवान महावीर स्वामी के सिद्धांत जीओ और जीने दो का अपना जीवन का ध्येय बना रखा है। उन्होंने कर्नाटक मेें गो हत्या निषेध अधिनियम लागू कराने के लिए लम्बी लड़ाई लड़ी। मुणोत सादगी पसंद है। उन्होंने अपने बच्चों को भी यही संस्कार दिए। वे सामाजिक और धार्मिक रूप से भी सक्रिय रहते हैं। इसी कारण उन्हें नाड़प्रभु केपेगोड़ा समेत कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है।

यह भी पढ़ें : आजादी के बाद भी आज तक रेलवे से नहीं जुड़ पाया राजस्थान का ये जिला मुख्यालय, अब मिलेगी गुड न्यूज?