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माउंट आबू. प्रदेश के सर्वाधिक ऊंचाई पर बसे शेरगांव के मतदाताओं ने आज तक किसी भी प्रत्याशी का चेहरा नहीं देखा है। मतदाता मतदान देकर चले जाते हैं लेकिन आज तक एक भी उम्मीदवार शेरगांव नहीं पहुंचा है। शेरगांव के मतदाताओं को मतदान की कवायद में वैज्ञानिक प्रगति के दौर के बावजूद इस बार भी हर चुनावों की भांति दो दिन घर छोडऩा पड़ेगा। गांव के बुजुर्ग बाशिंदों की माने तो गांव के कई लोगों को यहां तक पता नहीं है कि जिला परिषद से लेकर विधानसभा व लोकसभा में उनका नुमाइंदा कौन है। न ही आज तक कोई वोट मांगने उनके पास आया है। उसके बावजूद भी वे हर चुनाव में मतदान देते आ रहे हैं।
पढ़ाई से वंचित रहने को मजबूर बच्चे
गांव में पूर्व में टूटे-फूटे फर्श की टीन शेड के दो कमरों वाला एक विद्यालय भवन था, जहां पर उसी गांव का जोरावरसिंह सह शिक्षाकर्मी के रूप में तैनात था। जो प्रशासनिक कार्यों टीचर से लेकर चपरासी तक का काम अकेले ही करता था। लेकिन करीब दो वर्ष से स्कूल बंद है। वर्तमान में गांव में पढ़ाई की आयु के बच्चे पढ़ाई से वंचित है।
यह है शिक्षा का हाल
गांव में महिला शिक्षा की स्थिति बदतर है। महज एक महिला जमुना देवी पांचवीं तक पढ़ी हुई है। पिछले कुछ वर्षों से गांव की पांच बालिकाओं ने स्कूल जाना आरंभ किया था। बड़े बुजुर्गों में करीब 80 वर्षीय लूमसिंह यहां के एकमात्र व्यक्ति हैं जो अपने हस्ताक्षर करना जानते हैं। वह भी अंग्रेजों के शासन के दौरान गांव में लगान उगाही के लिए आने वाले सिपहसिलारों के गाइड के रूप में काम करते-करते साक्षर हो पाए थे। शेरगांव के मतदाता बाबूसिंह का कहना है कि उनके पूर्वजों की ओर से घने जंगलों, पठारों व चट्टानों को काटकर वर्षों की लंबी मेहनत के बाद दुर्गम मार्ग तैयार किया था। इसका कोई ऐतिहासिक प्रमाण तो नहीं मिलता है लेकिन आबूरोड के समीप चंद्रावती नगरी के उजडऩे से शेरसिंह नाम के एक व्यक्ति की ओर से शेरगांव बसाया गया था। संभवत: इसी दौरान मार्ग बना होगा। कालांतर में इसी मार्ग का अनुष्ठान करते हुए मुगलों से लोहा लेने के बाद महाराणा प्रताप ने शेरगांव में जाकर अज्ञातवास बिताया था।
इनका कहना है..
&वोट देने के लिए मतदाताओं को हर बार की तरह अलसुबह रात खुलने से पहले ही घर से पोटलियों में रोटी बंाधकर चलना पड़ेगा। पहाड़ी ढलान, अत्यंत उबड़ खाबड़, कंटीली पथरीली झाडिय़ों के बीच से गुजरते हुए करीब पंद्रह किलोमीटर की लंबी दूरी पैदल तय कर मतदान केंद्र उतरज पहुंचेंगे। वापस जाने में देर होने की स्थिति में रात को वहीं डेरा डालना पड़ेगा।
बलसिंह व भीमसिंह, शेरगांव
&आज तक जितने भी चुनाव हुए हैं। ग्राम पंचायत प्रत्याशी को छोड़कर कोई भी प्रत्याशी या उनका कोई प्रतिनिधि शेरगांव के मतदाताओं से वोट मांगने नहीं आया। यहां तक कि कई लोगों को यह भी पता नहीं है हमारे प्रतिनिधि कौन हैं। फिर भी हम लोग कठिन परिस्थितियों में वोट देने जाते हैं।
देवीसिंह व छतरसिंह, ग्रामीण शेरगांव
&कई लोग वोट देने के लिए निर्धारित तिथि से एक दिन पहले ही घर से चल देंगे। जो रात को उतरज गांव में पड़ाव डालकर दूसरे दिन वोट देकर वापस आकर उन परिजनों को वोट देने के लिए छुट्टी देंगे जो मवेशियों व बच्चों की देखरेख के लिए गांव में छोड़ दिए थे। जो शाम तक मतदान केंद्र पहुंचकर वोट देंगे। रात को वहीं रुककर दूसरे दिन वापसी करेंगे।
विजयसिंह व चिमनसिंह, ग्रामीण शेरगांव
Published on:
02 Dec 2018 11:39 am
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