26 जनवरी 2026,

सोमवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

VIDEO सिलिकोसिस की बीमारी लील रही परिवार, लाइलाज बीमारी है सिलिकोसिस, सिर्फ बचाव ही उपचार, जानिए कैसे…

  जागरूकता की कमी से कम उम्र में हार रहे जिन्दगी की जंग

2 min read
Google source verification
SIROHI

SIROHI

भरत कुमार प्रजापत
सिरोही.सिलिकोसिस नामक बीमारी की चपेट में आने से परिवार के परिवार खत्म हो रहे हैं। आदिवासी क्षेत्र पिण्डवाड़ा के कुछ गांवों में स्थिति तो अधिक भयानक है। यहां बीस से तीस साल की कम उम्र में युवा इस बीमारी से जिन्दगी की जंग हार रहे हैं। जागरूकता की कमी के चलते वीरवाड़ा में तीन सगे भाइयों के पांच बेटों की चंद महीनों के अंतराल में ही सिलिकोसिस नामक बीमारी से ही मौत हो गई। हंसते-खेलते परिवार इस बीमारी के दंश झेलते उजड़ गए। लगता है बीमारी से बचाव के सार्थक प्रयास नहीं हो रहे या फिर सबकुछ जानते समझते हुए भी अधिकांश देहाती मजदूर मास्क का उपयोग नहीं कर रहे। कारण कि सिर्फ बचाव ही इसका उपचार है।

तीस की उम्र में बेटे खो दिया...
वीरवाड़ा के प्यारेलाल बताते हैं कि कमाने की उम्र में बेटा इन्द्र पत्थर घड़ाई का काम करने लगा। कुछ दिनों बाद जब उसे सांस लेने में कठिनाई हुई तो जांच कराई। सिलिकोसिस बीमारी निकली। यहां-वहां उपचार कराया पर कोई फर्क नहीं पड़ा और अन्तत: तीस की उम्र में ही भगवान को प्यारा हो गया। वे बताते हैं अब परिवार में कोई कमाने वाला भी नहीं है। श्रम विभाग से भी कोई सहायता नहीं मिली है।

दो जवान बेटों को कंधा देना पड़ा...
सिलिकोसिस की बीमारी से मानाराम ने दो जवान बेटों को खो दिया। जैसा कि मानाराम बताते हैं कि उसके बेटे मगनाल (28) और भंवरलाल (25) पत्थर घड़ाई का कार्य करते थे। लेकिन बीमारी ने एक के बाद दोनों बेटों को छिन लिया। वे बताते हैं कि मैं ऐसा अभागा पिता हूं कि मुझे अपने दोनों बेटों को कंधा देना पड़ा।

आंखों से बह रहा दर्द
वीरवाड़ा के लसाराम की कहानी भी कारुणिक है। इनकी आंखों से टपक रहे आंसू ही उनके जेहन के दर्द को बयां कर रहे थे। जैसा कि वे बताते हैं कि एक के बाद एक सिलिकोसिस की बीमारी से दो बेटों की मौत हो गई। हर्षन और चम्पालाल दोनों पत्थर घड़ाई का कार्यकरते थे। पहले हर्षद की मौत हुई और अब 22 फरवरी को चम्पालाल का भी दम टूट गया।

ऐसे होती है यह बीमारी
चिकित्सक बताते हैं कि सिलिकोसिस नामक बीमारी लाइलाज है। जानकार लोग इसे एड्स से भी खतरनाक बताते हैं। पत्थर घड़ाईके कार्य से जुड़े मजदूरों को यह बीमारी अधिकतर होती है। कारण कि घड़ाई के दौरान उडऩे वाले पत्थर के सूक्ष्म कण सांस के जरिए शरीर में जाते हैं। धीरे-धीरे यह फैफड़ों में एकत्र हो जाते हैं। इससे मजदूर को टीबी के साथ-साथ सिलिकोसिस बीमारी हो जाती है। इससे सांस लेने में कठिनाई होती है। घबराहट होने लग जाती है। खांसी बढऩे और सांस लेने में दिक्कत होने से मरीज के फैफड़े जवाब दे जाते हैं। मरीज पैदल तक नहीं चल सकता और बिस्तर में पड़े-पड़े ही दम तोड़ देता है।

हम सिलिकोसिस पीडि़तों की मदद को हमेशा तैयार रहते हैं। समय-समय पर गांवों में शिविर लगाते हैं और लोगों को जागरूक कर रहे हैं। पत्थर घड़ाई में लगे मजदूरों को हिदायत देते हैं कि मास्क लगाकर काम करे। जहां काम कर रहे हैं वहां पानी का छिड़काव करे ताकि डस्ट नहीं उड़े। ठेकेदारों को भी मास्क के उपयोग के लिए पाबंद करते हैं। कारण कि यह बीमारी लाइलाज है।
मनोहरङ्क्षसह कोटड़ा, श्रम निरीक्षक, सिरोही

बड़ी खबरें

View All

सिरोही

राजस्थान न्यूज़

ट्रेंडिंग